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Monday, August 19, 2019

Red Symbol Of Love Laxman Mandir प्रेम का लाल प्रतीक लक्ष्मण मंदिर

August 19, 2019 0

Red Symbol Of Love Laxman Mandir  ...................
                                                              प्रेम का लाल प्रतीक लक्ष्मण मंदिर...............


Hello! दोस्तों आपने ताज महल के बारे में तो बहोत सुना होगा इसे लोग “प्यार की निशानी” भी कहते है जो आगरा में स्थित है। आज हम आपको ताजमहल से लगभग 11 सौ वर्ष पूर्व स्मारक“प्यार का लाल प्रतीक” के नाम से प्रशिद्ध लक्ष्मण मंदिर की,जो छत्तीसगढ़ में स्थित हैं।


लक्ष्मण मंदिर सिरपुर / Laxman Mandir


सिरपुर एक प्राचीनतम नगरी व छत्तीसगढ़ कि राजधानी थी जो छत्तीसगढ़ कि जीवनदायनी नदी चित्रोतपल (महानदी) के तट पर स्थित है |सिरपुर छत्तीसगढ़ के महासमुन्द जिले पर स्थित है| राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 6 पर आरंग से 24 कि.मी आगे बांयी ओर लगभग 16 कि.मी पर सिरपुर स्थित है रायपुर से सिरपुर कि दूरी 59 कि.मी है।

आगरा में अपनी चहेती बेगम आरजूमंद बानो (मुमताज) की स्मृति में शाहजहां ने ईसवी 1631-1645 के मध्य ताजमहल का निर्माण कराया। सफेद संगमरमर के ठोस पत्थरों को दुनियाभर के बीस हजार से भी अधिक शिल्पकारों द्वारा तराशी गई इस कब्रगाह को मुमताज महल के रूप में प्रसिद्धि मिली। लेकिन लक्ष्मण मंदिर की प्रेम कहानी ताजमहल से भी अधिक पुरानी है। दक्षिण कौशल में पति प्रेम की इस निशानी को भूगर्भ से उजागर हुए तथ्यों से स्पष्ट है कि 635-640 ईसवीं में राजा हर्षगुप्त की याद में रानी वासटादेवी ने बनवाया था। खुदाई में मिले शिलालेखों के मुताबिक प्रेम के स्मारक ताजमहल से भी अधिक पुरानी प्रेम कहानी लक्ष्मण मंदिर स्मारक के रूप में प्रमाणित है।



छठी शताब्दी में निर्मित भारत का सबसे पहला ईंटों से बना मंदिर यहीं पर है. सोमवंशी नरेशों ने यहां लाल ईंटो से राम मंदिर और लक्ष्मण मंदिर का निर्माण कराया था. अलंकरण, सौंदर्य, मौलिक अभिप्राय व निर्माण कौशल की दृष्टि से यह अपूर्व है। सिरपुर का पुरा इतिहास लक्ष्मण मंदिर के वैभव से सदैव जुड़ा रहा। हरेक कालक्रम में इससे जुड़े नए तथ्य भी सामने आए, जिसमें लगभग पंद्रह सौ वर्षों पूर्व निर्मित ईंटों से बनी इस इमारत की शिल्पगत विशेषताओं की अधिक चर्चा की गई।



महाभारत काल में इसका नाम चिनागढ़पुर था |ईशा पुर 6 वी शताब्दी में इसे श्रीपुर कहा जाता था 5 वी सदी से 8 वी सदी के मध्य यह दक्षिण कोशल कि राजधानी थी 7 वी सदी के चीनी यात्री हेडसम भारत आया था उस समय उसने पुरे भारत कि यात्रा कि थी वा घूमते हुवे श्रीपुर आया था तब उस समय वहा पर बौद्ध धर्म विकसित अवस्था में था। तात्कालिक समय में पाण्ड़ुवंश शासण कर रहा था| उसकी माता वासटा ने अपने पति हर्षगुप्त कि याद में लक्ष्मण मंदिर का निर्माण करवाया था| लाल इटो से बना यह मंदिर विश्व प्रसिद्ध हैं।




सन 1977 में यहाँ पर पुरातत्व विभाग द्वारा यहाँ पर खुदाई का कार्य करवाया था जिसमे अनेक पुरातात्विक सामग्री मिली है जैसे शिला लेख ,ताम्र पत्र बौद्ध विहार अनेक प्राचीन मुर्तिया प्राप्त हुवा था, जो अपने आप में अध्भूत है। यहाँ पर अति प्राचीन मंदिर वा मुर्तिया स्थित है जिसे एक संग्राहलय में सजो के रखा गया है जिसे आप एक साथ देख सकते है। मंदिर अपनी बनावट और महीन नक्काशी के लिये प्रसिद्ध है सिरपुर में लक्ष्मण मंदिर के साथ -साथ बहुत से मंदिर देखने योग्य है जिसमे प्रमुख गंधेश्वर महादेव मंदिर ,राधा कृष्णा,चंडी मंदिर ,आनंद प्रभु कुटीर विहार प्रमुख रूप से है। यहा पर अभी भी खुदाई करने से पुराने अवशेस मुर्तिया आदि मिलती है। सिरपुर का इतिहास अभी और खोजना बाकि है।



यहाँ पर सिरपुर के सम्मान में सिरपुर महोत्सव का आयोजन शासन के द्वार किया जाता है जिसमे भारी संख्या में लोग यहां उपस्थिति होते है और दे रंगारंग धार्मिक कार्यक्रम का आनंद उठाते है। यहा पर भारी मात्रा में सावन के महीने में शिव भक्त आतें है और भगवान गंधेश्वर को जल अभिषेक करते है पूरा वातावरण शिव भक्ति में मंगन रहते है, यहाँ पर प्रतिवर्ष शिवरात्रि पर 3 दिनों का मेला लगता है तब यहां का भीड़ देखने लायक होता है।



 यहाँ पर भारत से हे नहीं देश - विदेश से इस नगरी और लक्ष्मण मंदिर को देखने के लिये आते है। सिरपुर एक उत्तम पर्यटन स्थल है सिरपुर प्राकृतिक दृष्टी से परिपूर्ण है यहाँ के घने जंगल के बीच मानो सिरपुर प्राकृति की गोद मे स्थित है।





भारतवर्ष की पावन भूमि के हृदय में स्थित छत्तीसगढ़ अनादिकाल की देवभूमि के रूप में प्रतिष्ठित है. इस भूमि पर विभिन्न संप्रदायों के मंदिर, मठ, देवालय हैं जो इसकी विशिष्ट संस्कृति और परंपराओं को और भी सुदृढ़ बनाते हैं। ऐसी ही विशिष्टता को सदियों से समेटे रहा है छत्तीसगढ़ का सिरपुर स्थित लाल ईंटों से बना मौन प्रेम का साक्षी लक्ष्मण मंदिर. बाहर से देखने पर यह सामान्य हिंदू मंदिर की तरह ही नज़र आता है, लेकिन इसके वास्तु, स्थापत्य और इसके निर्माण की वज़ह से इसे लाल ताजमहल भी कहा जाता है. चूंकि, यह कौशल प्रदेश के हर्ष गुप्त की विधवा रानी वासटा देवी के अटूट प्रेम का प्रतीक बताया जाता है, इसलिए जानना दिलचस्प रहेगा– बौद्ध धर्म का तीर्थ रहा सिरपुर!






छत्तीसगढ़ में महानदी के तट पर स्थित सिरपुर का अतीत सांस्कृतिक विविधता व वास्तुकला के लालित्य से ओत-प्रोत रहा है। इसे 5वीं शताब्दी के आसपास बसाया गया था. ऐसे प्रमाण मिलते हैं कि यह 6ठी सदी से 10वीं सदी तक बौद्ध धर्म का प्रमुख तीर्थ स्थल रहा. खुदाई में यहां पर प्राचीन बौद्ध मठ भी पाए गए, वह तो 12वीं सदी में आए एक विनाशकारी भूकंप ने इस जीवंत शहर को पूरी तरह से तबाह कर दिया. कहते हैं इस आपदा से पहले यहां बड़ी संख्या में बौद्ध लोग रहा करते थे. प्राकृतिक आपदाओं के कारण उन्हें इस शहर को छोड़ना पड़ा




प्राकृतिक आपदाओं से बेअसर लक्ष्मण मंदिर की सुरक्षा और संरक्षण के कोई विशेष प्रयास न किए जाने के बावजूद मिट्टी के ईंटों की बानी यह इमारत अपने निर्माण के चौदह सौ सालों बाद भी शान से खड़ी हुई है। 12वीं शताब्दी में भयानक भूकंप के झटके में सारा श्रीपुर (अब सिरपुर) जमींदोज़ हो गया। 14वीं-15वीं शताब्दी में चित्रोत्पला महानदी की विकराल बाढ़ ने भी वैभव की नगरी को नेस्तनाबूत कर दिया लेकिन बाढ़ और भूकंप की इस त्रासदी में भी लक्ष्मण मंदिर अनूठे प्रेम का प्रतीक बनकर खड़े रहा है। हालांकि इसके बिल्कुल समीप बना राम मंदिर पूरी तरह ध्वस्त हो गया और पास ही बने तिवरदेव विहार में भी गहरी दरारें पड़ गई,लेकिन लक्ष्मण मंदिर इमारत शान से आज भी मजबूती के साथ खड़ा है।



आपको जानकर यह हैरानी हो सकती है कि यूरोपियन साहित्यकार “एडविन एराल्ड” ने इस मंदिर की तुलना प्रेम के प्रतीक ताजमहल से की है. इन्होंने ताजमहल को जीवित पत्थरों से निर्मित प्रेम की संज्ञा दी और लक्ष्मण मंदिर को लाल ईंटों से बना मौन प्रेम का प्रतीक बताया और साहित्यकार “अशोक शर्मा” ने ताजमहल को पुरूष के प्रेम की मुखरता और लक्ष्मण मंदिर को नारी के मौन प्रेम और समर्पण का जीवंत उदाहरण बताया है। उनका मानना है कि इतिहास गत धारणाओं के आधार पर ताजमहल और लक्ष्मण मंदिर का तुलनात्मक पुनर्लेखन किया जाए तो लक्ष्मण मंदिर सबसे प्राचीन प्रेम स्मारक सिद्ध होता है।



ताजमहल समय के गाल पर जमा हुआ आंसू है, लेकिन लक्ष्मण मंदिर समय के भाल पर आज भी बिंदी सा चमक रहा है।

“गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर”



तो दोस्तो आशा करता हु की आप को ये जानकारी अछि लगी और आप एक बार जरूर यह जान चाहोगे। तो दोस्तो हुम् फिर आपके लिए ऐशी रोचक जानकारी लेते रहेंगे आप और ये जानकारी अच्छी लगी तो Like,Coment और Share जरूर कीजिये।


धन्यवाद☺️

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परम प्रेम की परिणिति काम-क्रीडा को परिलक्षित करती छत्तीसगढ का खजुराहो भोरमदेव मंदिर।

August 19, 2019 0

छत्तीसगढ का खजुराहो भोरमदेव मंदिर।




Hello! दोस्तो आज हम एक ऐसे सुंदरता के बारे में बात करने जा रहे है जिसे देखने लोग दूर दूर से आते है । छत्तीसगढ़ राज्य के खजुराहो कहे जाने वाले भोरमदेव मंदिर का जोकि जनजातीय संस्‍कृति, स्‍थापत्‍य कला और प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर है। इस दृश्य को देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते है।

हर दीवार और स्तम्भ में लोग बस एक ही काम में व्यस्त हैं और वो है प्रेम क्रीड़ा. स्त्री-पुरुष के परम प्रेम की परिणिति काम-क्रीडा को परिलक्षित करती. वहीं यहाँ की दीवारें मानों कह रही हों कि प्रेम और प्रेम अहसास बस यहीं है यहाँ की मूर्तियों में.




भारत का हर एक राज्य अपनी किसी न किसी खास चीज के लिए प्रसिद्ध है. इसी कड़ी में अगर छत्तीसगढ़ की बात करें, तो वहां का भोरमदेव मंदिर खासा आकर्षण का केंद्र रहा है, जोकि जनजातीय संस्‍कृति, स्‍थापत्‍य कला और प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर है.चूंकि, भोरमदेव के मंदिर की तुलना मध्य प्रदेश के खजुराहो और ओडिशा के सूर्य मंदिर से की जाती है. ऐसे में इसको जानना दिलचस्प रहेगा। भोरमदेव मंदिर छत्तीसगढ के कबीरधाम जिले में कबीरधाम से 18 कि॰मी॰ दूर तथा रायपुर से 125 कि॰मी॰ दूर चौरागाँव में एक हजार वर्ष पुराना मंदिर है।


Chilphi ghati | 


मंदिर का मुख पूर्व की ओर है। मंदिर नागर शैली का एक सुन्दर उदाहरण है। मंदिर में तीन ओर से प्रवेश किया जा सकता है। मंदिर एक पाँच फुट ऊंचे चबुतरे पर बनाया गया है। तीनो प्रवेश द्वारो से सीधे मंदिर के मंडप में प्रवेश किया जा सकता है। मंडप की लंबाई 60 फुट है और चौडाई 40 फुट है। मंडप के बीच में में 4 खंबे है तथा किनारे की ओर 12 खम्बे है जिन्होने मंदप की छत को संभाल रखा है। सभी खंबे बहुत ही सुंदर एवं कलात्मक है। प्रत्येक खंबे पर कीचन बना हुआ है। मंदिर के गर्भगृह में अनेक मुर्तियां रखी है तथा इन सबके बीच में एक काले पत्थर से बना हुआ शिवलिंग स्थापित है।

मंदिर के चारो ओर बाहरी दीवारो पर विश्नु, शिव चामुंडा तथा गणेश आदि की मुर्तियां लगी है। इसके साथ ही लक्ष्मी विश्नु एवं वामन अवतार की मुर्ति भी दीवार पर लगी हुई है। देवी सरस्वती की मुर्ति तथा शिव की अर्धनारिश्वर की मुर्ति भी यहां लगी हुई है

मंदिर की कलाकृति



छत्तीसगढ़ का भोरमदेव, जहाँ कामकला में सराबोर मूर्तिया बरबस ही इंसान को हजारों साल पहले के भारत में ले जाती हैं. भोरमदेव मंदिर की मान्यता सिर्फ इसलिए नहीं की वह एक मंदिर है और वहां शिवजी भोरमदेव के रूप में विराजते हैं.

इससे बढ़कर इसकी मान्यता इसलिए भी है, क्योंकि इसका धार्मिक और पुरातात्विक महत्त्व भी है. भोरमदेव का मंदिर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह के गृहग्राम कवर्धा जिले से मात्र से 18 किलोमीटर की दूरी पर सतपुड़ा पर्वत श्रेणियों के बीच स्थित है. इसके पूर्व की में मैकल पर्वत श्रृंखलाएं, जो इसे और भी सुरम्य बनाती हैं.

कवर्धा एक छोटा सा जिला है, जो अपने में किसी बड़े शहर के मानिंद खूबसूरती समेटे है. इसी कवर्धा से भोरमदेव मंदिर का रास्ता है, जो हराभरा और शांत है. धीरे-धीरे घने होते वन और उनके बीच सिमटता मंदिर सच में स्वर्ग का अहसास करवाता है.

भगवान शिव का बसेरा


मड़वा महल




भोरमदेव के बारे में मान्यता है कि वह शिव के ही एक अन्‍य रूप हैं, जो गोंड समुदाय के पूजनीय देव थे. इन्ही भोरमदेव के नाम से इस मंदिर का निर्माण हुआ. इसके आस पास और भी देवताओं जैसे वैष्‍णव, बौद्ध और जैन प्रतिमाएं भी हैं.

किन्तु, शिव के मंदिर की भव्यता यह साबित करने के लिए काफी है कि इस मंदिर के निर्माता नागवंशी शासक शिव के परम भक्त थे. शायद यही कारण है कि यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है. भगवान शिव यहां भी शिवलिंग रूप में विराजमान हैं.

मुख्य मंदिर दो भागों में विभाजित है. इसके बड़े भाग यानि मुख मंडप में शिवलिंग है , जो एक ऊँचे मंच पर स्थित है. यहाँ शिवलिंग पूर्व मुखी है. शिव के अलावा भगवान विष्णु और उनके कई अवतार जैसे नरसिंह, वामन, नटराज, कृष्ण आदि की मूर्तिया हैं. साथ ही भगवान गणेश, काल भैरव और सूर्य भी यहां देखने को मिलते हैं.



गढ़ो का राज्य 






कहा जाता है कि अपने छत्‍तीसगढ़ गढ़ों यानि किलों के कारण छत्तीसगढ़ का नाम पड़ा. स्‍थापत्‍य कला के अनेक उदाहरण आपको यहाँ देखने को मिल जाएंगे. किन्तु, भोरमदेव की स्थापत्य कला उन सबसे जुदा है.

इस मंदिर का सौंदर्य आपको खजुराहो, अन्जनता एलोरा और कोणार्क की याद दिलाता है. यही कारण है कि बोलचाल की भाषा ने इसे छत्तीसगढ़ का खजुराहों भी कह दिया जाता है. यहां की कामुक मुद्रा वाली मूर्तियां, जो यकीनन काफी सुंदर हैं.

इस मंदिर में बाहर की ओर 54 की संख्या में मूर्तियाँ है, जो कामसूत्र के विभिन्न आसनों से प्रेरित हैं. कई लोग इसको शाश्वत प्रेम और सुंदरता का प्रतीक मानते हैं, तो कई इनकी कला को देखकर अभिभूत होते हैं. इस मंदिर के आधार पर नागवंशी शासकों को खजुराहो के शासकों के समकालीन माना जा सकता है.


मंदिर में जो भी निर्माण कार्य है किए गए है, उन्हें देखकर ऐसा लगता है, जैसे मानो वह खजुराहो से प्रेरित हैं. हालांकि, यह कितना सच यह कुछ नहीं कहा जा सकता।


यह मंदिर 11 शताब्दी के आसपास बना कला का बेहतरीन का नमूना हैं. अगर शैली की बात की जाए, तो इसके हर भाग में कलाकृतियां बारीकी से उकेरी गयी हैं.मंदिर में सिर्फ कामुक मूर्तियाँ ही नहीं, बल्कि उस काल का पूरा जीवन दिखता है.


सम्भोग तो है पर साथ ही नाच, गाना, भक्ति और वो सब मुद्राएं हैं, जो खुशहाल जीवन का प्रतीक होती हैं. नाचते गाते आदिवासी उस काल के जीवन-दर्शन को दिखाते हैं, जहां कोई भेदभाव भाव नहीं था. सब साथ मिलकर नाच गाकर उत्सव मानते दिखते हैं.

प्रेम उत्सव! दीवारे भक्ति का प्रतीक




हर दीवार और स्तम्भ में लोग बस एक ही काम में व्यस्त हैं और वो है प्रेम क्रीड़ा. स्त्री-पुरुष के परम प्रेम की परिणिति काम-क्रीडा को परिलक्षित करती. वहीं यहाँ की दीवारें मानों कह रही हों कि प्रेम और प्रेम अहसास बस यहीं है यहाँ की मूर्तियों में.


भोरमदेव मंदिर की स्‍थापत्‍य चंदेल शैली है. खजुराहो और कोणार्क के सूर्य मंदिर के समान यहाँ भी मंदिर की बाहरी दीवारों पर तीन समानांतर क्रम में विभिन्‍न प्रतिमाओं को उकेरा गया है!


तो दोस्तो ये थी छत्तीसगढ़ की सुंदरता का एक रूप आशा करता हु की आपको ये जानकारी अच्छी लगी होगी और आगे आप यह जाने का प्लान बनाएंगे यह कि खूबसूरती का मजा उठाने और अगर ये जानकारी आपको अच्छी लगी तो like👍 और comment जरूर कीजिये ताकि आगे हुम् इशी तरह नई-नई जानकारियाँ आपके लिए लाते रहे।


धन्यवाद☺️

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Friday, August 9, 2019

Madku Dweep-शिवनाथ नदी के बीचों-बीच पर्यटन की अनूठी जगह मदकू द्वीप दो धर्म और आस्था का संगम स्थल

August 09, 2019 0
भाटापारा नगर प्रमुख व्यावसायिक केन्द्र है। यहाँ से कड़ार-कोटमी गांव होते हुए मदकू द्वीप लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर है। रायपुर-बिलासपुर राजमार्ग के 76 वें माईल स्टोन पर स्थित बैतलपुर से यह दुरी 4 किलोमीटर है। रेल और सड़क मार्ग दोनो से इस स्थान पर पहुंचा जा सकता है।





शिवनाथ नदी  के बीचों-बीच पर्यटन की अनूठी जगह मदकू द्वीप। इससे अहम कि यह दो धर्म और आस्था का संगम स्थल है। सदानीरा शिवनाथ की धाराएं यहां ईशान कोण में बहने लगती हैं। वास्तु शास्त्र के हिसाब से यह दिशा सबसे पवित्र मानी जाती है।

ग्रामीण जनता अज्ञात अतीत काल से इसे शिव क्षेत्र मानते आ रही है यहाँ श्रावण मास, कार्तिक पूर्णिमा, शिवरात्रि के अतिरिक्त चैत्र मास में विशिष्ट पर्वों पर क्षेत्रिय जनों का यहाँ धार्मिक, आध्यात्मिक समागम होता है। सांस्कृतिक दृष्टि से जब हम विचार करते हैं, तो वर्तमान प्रचलित नाम मदकू संस्कृत के मण्डुक्य से मिश्रित अपभ्रंश नाम है। शिवनाथ की धाराओं से आवृत्त इस स्थान की सुरम्यता और रमणीयता मांडुक्य ॠषि को बांधे रखने में समर्थ सिद्ध हुई और इसी तपश्चर्या स्थली में निवास करते हुए मांडुक्योपनिषद जैसे धार्मिक ग्रंथ की रचना हुई। शिव का धूमेश्वर नाम से ऐतिहासिकता इस अंचल में विभिन्न अंचल के प्राचीन मंदिरों के गर्भ गृह में स्थापित शिवलिंगों से होती है अर्थात पुरातात्विक दृष्टि से दसवीं शताब्दी ईंसवी सन में यह लोकमान्य शैव क्षेत्र था। दसवीं शताब्दी से स्थापित तीर्थ क्षेत्र के रुप में इसकी सत्ता यथावत बनी हुई है।”

 इसी प्रकार संस्कृति विभाग के ही राहुल कुमार सिंह ने मदकू के इतिहास संबंधी पुष्ट और अधिकृत जानकारी प्रदान की। जिनके अनुसार -” इंडियन एपिग्राफ़ी के वार्षिक प्रतिवेदन 1959-60 में क्रमांक बी-173 तथा बी 245 पर मदकू घाट बिलासपुर से प्राप्त ब्राह्मी एवं शंख लिपि के शिलालेखों की प्रविष्टि है, जो लगभग तीसरी सदी ईंसवी के हो सकते हैं, भारतीय प्रुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के दक्षिण-पुर्वी वृत्त के कार्यालय विशाखापटनम में रखे हैं।” इससे सिद्ध होता है कि मदकू द्वीप का इतिहास गौरवशाली रहा है। यहाँ की प्राचीन धरोहर को सुरक्षित रखने का एवं प्राकृतिक सौंदर्य से युक्त इस द्वीप का पर्यटन हेतु विकास करने का कार्य छत्तीसगढ शासन कर रहा है।




24 हेक्टेयर में फैले मदकू द्वीप के पास ही एक और छोटा द्वीप 5 हेक्टेयर का है। दोनों बीच टूरिस्ट बोटिंग का आनंद ले सकते हैं। जैव विविधता से परिपूर्ण द्वीप में माइक्रो क्लाइमेट (सोला फॉरेस्ट) निर्मित करता है। यहां विशिष्ट प्रजाति के वृक्ष पाए जाते हैं। इसमें चिरौट (सिरहुट) के सदाबहार वृक्ष प्रमुख हैं।



शिवनाथ नदी के पानी से घिरा मदकू द्वीप आम तौर पर जंगल जैसा ही है।  शिवनाथ नदी के बहाव ने मदकू द्वीप को दो हिस्सों में बांट दिया है। एक हिस्सा लगभग 35 एकड़ में है, जो अलग-थलग हो गया है। दूसरा करीब 50 एकड़ का है, जहां 2011 में उत्खनन से पुरावशेष मिले हैं। 

नदी किनारे से पुरावशेष के मूल अकूत खजाने तक पहुंचने की पगडंडी के दोनों पेड़ों के घने झुरमुट हैं। यहां नदी से बहते पानी की कलकल आती आवाज रोमांचित करती हैं। चलते-चलते जैसे ही पुरातत्व स्थान का द्वार दिखता है, हमारी उत्सुकता भी शिवनाथ नदी की माफिक उफान पर होती है। मुख्य द्वार से अंदर पहुंचते ही दायीं तरफ पहले धूमेश्वर महादेव मंदिर और फिर श्रीराम केवट मंदिर आता है। थोड़ी दूर पर ही श्री राधा कृष्ण, श्री गणेश और श्री हनुमान के प्राचीन मंदिर भी हैं। 



 11वीं सदी के कल्चुरी कालीन पुरावैभव की कहानी बयां करते हैं। यहां उत्खनन के साक्षी रहे छत्तीसगढ़ के संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के पर्यवेक्षक प्रभात कुमार सिंह ने एक पुस्तक में वर्णन किया है, इसे मांडूक्य ऋषि की तपो स्थली के रूप में तीन दशक पहले प्रोफेसर डॉ. विष्णु सिंह ठाकुर ने चिन्हित किया था। संभवत: यही पर ऋषि ने 'माण्डूक्योपनिषद्' की रचना की। संविधान में समाहित किए गए 'सत्यमेव जयते' भी इसी महाकृति के प्रथम खंड का छठवां मंत्र है।

वर्ष 1985 से यहां श्री राधा कृष्ण मंदिर परिसर में पुजारी के तौर पर काम कर रहे वीरेंद्र कुमार शुक्ला बताते हैं, पुरा मंदिरों के समूह वाला गर्भगृह पहले समतल था। जब खुदाई हुई तो वहां 19 मंदिरों के भग्नावशेष और कई प्रतिमाएं बाहर आईं। इसमें 6 शिव मंदिर, 11 स्पार्तलिंग और एक-एक मंदिर क्रमश: उमा-महेश्वर और गरुड़ारूढ़ लक्ष्मी-नारायण मंदिर मिले हैं। खुदाई के बाद वहां बिखरे पत्थरों को मिलाकर मंदिरों का रूप दिया गया। मदकू द्वीप की खुदाई में 6 शिव मंदिर, 11 स्पार्तलिंग और एक-एक उमा-महेश्वर और गरुड़ारूढ़ लक्ष्मी-नारायण मंदिर मिले। बाद में वहां पत्थरों को मिलाकर मंदिरों का रूप दिया गया।


मंदिरों के गिरने के विषय में कहते हैं कि-“आज से करीब डेढ दो सौ साल पहले शिवनाथ नदी में भयंकर बाढ आई थी। जिसका बहाव दक्षिण से उत्तर की ओर था। जिससे सारे मंदिरों के पत्थर हमको दक्षिण से उत्तर की ओर ढहे हुए मिले। यह बाढ से ढहने का प्रमाण है। बाढ इतनी भयंकर थी कि टापू के उपर भी एक दो मीटर पानी बहने लगा था। बाढ से विनाश होने का प्रमाण यह भी है कि चारों तरफ़ महीन रेत (शिल्ट) जमा है। यह महीन शिल्ट सिर्फ़ पानी से ही आ सकता है। लगभग एक मीटर का शिल्ट डिपाजिट है। जो स्पष्ट दिख रहा है काली लाईन के नीचे। बाढ का पानी तेजी से आया और काफ़ी समय तक यह द्वीप पानी में डूबा रहा। अधिकांश पत्थर तो टूट-फ़ूट गए हैं। जितने भी पत्थर यहाँ उपलब्ध है उनसे पुनर्रचना हम कर दें यही हमारा प्रयास है। इन मंदिरों की नींव सलामत थी इसलिए हम उसी पर पुनर्रचना कर रहे हैं।

पांच साल में इस पुरावैभव के संरक्षण को लेकर अपेक्षित काम नहीं हो पाया। लोहे का डोम बना कर इन मंदिरों को धूप और बरसात से सुरक्षित तो कर लिया गया, लेकिन सदियों पुरानी इस विरासत की पुख्ता सार-संभाल करने वाला कोई नहीं है। क्या आधे-अधूरे साधनों से हम इस धरोहर को बचा पाएंगे।








यह सवाल इसलिए भी अहम हो चुका है, क्योंकि मुंगेली और बलौदाबाजार जिले को यहां मिलाने वाली शिवनाथ नदी के किनारों को रेत माफिया जिस तरह आसपास की जगहों को खोखला कर रहा है, वह इस मदकू द्वीप के लिए बड़ा खतरा बना हुआ है। छत्तीसगढ़ के इस 'मोहनजोदड़ो' खजाने के जमीन में छिपे अनमोल रहस्यों को बाहर लाने के लिए गहन शोध के साथ ही राजकीय संरक्षण भी जरुरी है।

1959-60 की इंडियन एपिग्राफी रिपोर्ट में मदकू द्वीप से प्राप्त दो प्राचीन शिलालेखों का उल्लेख है। पहला लगभग तीसरी सदी ईस्वी की ब्राह्मी लिपि में अंकित है। इसमें किसी अक्षय निधि का उल्लेख किया गया है। दूसरा शंखलिपि में है। दोनों भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तत्कालीन दक्षिण पूर्व मंडल कार्यालय विशाखापट्नम में रखे गए हैं।
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मोदी सरकार की पेंशन योजना की शुरुआत आज से , ऐसे मिलेगा ₹3000 मासिक पेंशन का फायदा प्रधानमंत्री श्रमयोगी मानधन योजना की सम्पूर्ण जानकारी

August 09, 2019 0

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूसरे कार्यकाल के ऐतिहासिक पेंशन योजना की शुरुआत आज से होने वाली है। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर इसका आगाज दिल्ली से करेंगे। योजना का लाभ देश के 5 करोड़ किसानों को मिलने की उम्मीद है। आजादी के बाद यह पहली बार है जब किसानों को पेंशन देने के लिए योजना शुरू होने जा रही है।
मोदी सरकार की किसान पेंशन योजना किसानों को पेंशन की सुविधा उपलब्ध कराएगी। यह देश भर के छोटे और सीमांत किसानों (एसएमएफ) के लिए स्वैच्छिक और अंशदायी पेंशन योजना है। इस योजना के लिए 18 से 40 साल तक के किसान आवेदन कर सकेंगे।
योजना से जुडऩे के लिए किसानों को मासिक  योगदान देना होगा। यह रकम उम्र बढऩे के हिसाब से बढ़ती है। इसके बाद स्कीम में 60 साल से ऊपर के किसानों को 3000 रुपये तक प्रति माह पेंशन मिलेगी।

वहीं अगर किसान की मौत हो जाती है तो उसके परिवार को 50 फीसदी रकम का भुगतान मिलता रहेगा। यानी उसे 1500 रुपये मिल सकते हैं। इसकी जिम्मेदारी जीवन बीमा निगम को दी गई है।

असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए इस योजना की घोषणा की गई, प्रधानमंत्री श्रमयोगी मानधन योजना का ऐलान पियूष गोयल ने बजट 2019 में किया । उन्होंने बताया कि 55₹ से ₹200 मासिक योगदान कर कामगार 60 साल की आयु होने के बाद में ₹3000 पेंशन के तौर पर पाएंगे ।

असंगठित क्षेत्र के 10 करोड़ कामगारों को रिटायरमेंट के बाद एक न्यूनतम पेंशन मुहैया कराएगी । केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन योजना के लिए नियम व शर्ते जारी कर दी है । योजना का लाभ लेने वाले लाभार्थी को 60 वर्ष की आयु के बाद ₹3000 मासिक पेंशन के तौर पर दी जाएगी । पेंशनर की मृत्यु अगर किसी कारण से हो जाती है तो इस पेंशन पर केवल उसके पार्टनर का हक होगा ! यानी इस प्रकार की स्थिति में बच्चों को इसका पात्र नहीं बनाया गया है ।

प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन योजन में इन को मिलेगा लाभ ।

इस योजना के अंतर्गत असंगठित क्षेत्र के लोगों को ही लाभ दिया जाएगा । इनमें घर के काम करने वाले , रेहडी लगाने वाले दुकानदार , ड्राइवर, दर्जी, पलंबर, वर्कर, कृषि कामगार मोची, धोबी, चमरा कामगार आदि को शामिल किया गया है ।

PMSYMY के लिए जरूरी दस्तावेज

प्रधानमंत्री श्रमयोगी मानधन योजना का लाभ लेने के लिए आपके पास आवश्यक दस्तावेज होने चाहिए ।
1. आवेदक का आधार कार्ड
2. आवेदक का बैंक खाता
3. आवेदक असंगठित क्षेत्र का कार्यकर्ता होना चाहिए
4. आवेदक की मासिक आय ₹15000 से कम हो

प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन योजना(PMSYM) के लाभ एवं शर्तें

– मंत्रालय द्वारा अधिसूचना के मुताबिक यह योजना असंगठित क्षेत्र के काम करने वाले पर ही लागू होगी ।
– इस योजना का लाभ उठाने वाले का मासिक आय ₹15000 से अधिक नहीं होनी चाहिए ।
– वर्कर की आयु 18 वर्ष से कम और 40 वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए
– पहले से ही केंद्र सरकार की सहायता वाली किसी अन्य पेंशन स्कीम का सदस्य होने की स्थिति में मानधन योजना का लाभ नहीं मिल पाएगा
– यदि आवेदक अपने हिस्से का योगदान करने में चूक जाता है,तो वह ब्याज़ के साथ बकाया का भुगतान करने में समर्थ होगा इसकी अनुमति उसे दी जाएगी । इसका ब्याज सरकार के द्वारा तय किया जाएगा
– योजना का लाभार्थी 10 साल के भीतर योजना को छोड़ना चाहता है तो उसे केवल उसका योगदान की राशि और उस पर बैंक का ब्याज दर ही लौटाया जाएगा
-आवेदक स्कीम के चालू होने से 10 साल बाद लेकिन 60 साल के भीतर स्कीम से बाहर निकलता है तो उसे पेंशन स्कीम का पूरा पूरा लाभ दिया जाएगा
– किसी कारणवश आवेदक की मृत्यु हो जाती है तो इस योजना को उसका जीवन साथी चला सकता है, और योजना का लाभ भी उसे दिया जाएगा ।
– यदि आवेदक 60 साल की उम्र से पहले अस्थाई रूप से विकलांग हो जाता है और स्कीम में योगदान करने में असमर्थ है तो उसके पास स्क्रीम के वास्तविक ब्याज के साथ अपने हिस्से का योगदान लेकर स्कीम से बाहर निकलने की भी अनुमति दी जाती है
– 60 वर्ष की आयु के बाद जब आवेदक को पेंशन की रकम मिलती है तो उसमें से 50 फ़ीसदी पर उसके जीवन साथी का भी हक होता है, आवेदक के मृत्यु के बाद बच्चों को पेंशन बेनिफिट लेने का कोई हक नहीं होता है ।
– प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन योजना में
सब्सक्राइबर को 60 साल की आयु के बाद न्यूनतम ₹3000 मासिक पेंशन देने का प्रावधान है ।

प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन योजना में कितना निवेश करना होगा ।

प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन योजना के अंतर्गत 18 से 28 वर्ष आयु के लोगों को हर महीने 55 से 200 रुपए तक जमा करने हो सकते हैं जिसका लिस्ट इस प्रकार से दिया गया है ।

नीचे के लिस्ट से आपको काफी मदद मिलेगी इसे जरूर देखें ।

व्यक्ति की आयु ( वर्ष मे )व्यक्ति द्वारा जमा रुपयेसरकार द्वारा जमा रुपये
185555
195858
206161
216464
226868
237272
247676
258080
268585
279090
289595
29100100
30105105
31110110
32120120
33130130
34140140
35150150
36160160
37170170

प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन योजना के लिए ऑनलाइन आवेदन । APPLY FOR PRADHAN MANTRI SHRAMYOGI MANDHAN YOJANA

 प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन योजना के लिए ऑनलाइन आवेदन 15 फरवरी से शुरूहो चूका है .

ऑनलाइन आवेदन के लिए निकटतम  CSC केंद्र से संपर्क करें .
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