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Friday, November 8, 2019

सामाजिक गुलामी से मुक्ति का एक ही रास्ता है कि दलित-पिछड़ा इकट्ठा हों..

लेख:- चंद्र भूषण सिंह यादव

सामाजिक गुलामी से मुक्ति का एक ही रास्ता है कि दलित-पिछड़ा इकट्ठा हों........
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       दलित-पिछड़े को सामाजिक गुलामी से मुक्ति के लिए इकट्ठा होना होगा।यह काम है तो कठिन पर ऐसा भी नही है कि कभी हो नही सकता।दलित-पिछड़ा एका आज नही तो कल निश्चित होगा,हां इस निमित्त हमे प्रयत्नशील रहना होगा।दलित-पिछड़ा एका के लिए सबसे जरूरी जो बात है वह इन दोनों वर्ग के बुद्धिजीवियों का अपने जातिगत दुराग्रह को ताक पर रखना है।
          मैं देखता हूँ कि हम उनसे नही लड़ते जो हमे सदियों से तमाम तरह के अपमानजनक अलंकरणों से अलंकृत किये हुए हैं और सामाजिक तौर पर गुलाम बना कर रखे हुए हैं।हम अपने आप को श्रेष्ठ घोषित करने में अपनी ऊर्जा खपाने में मस्त व ब्यस्त हो जा रहे हैं जो अभिजात्य जनों की जीत का सबसे बड़ा कारण है।
        दलित-पिछड़ा समाज को जो लगभग सात हजार जातियों और लाखों उपजातियों में विभक्त कर ऐसे न तोड़ दिया गया है कि उसकी एकता किसी पलड़े पर मेढक तौलने जैसी हो जाती है।हम जातीय अपमान को भूल बहुजन समाज की दीगर जातियों से श्रेष्ठ होने का तर्क गढ़ने लगते हैं।हम भूल जाते हैं कि हम अपने अन्य मूलनिवासी भाईयों से भले ही उच्च होने का प्रमाण प्राप्त कर लें लेकिन सनातन पंथ में जो भूसुर हैं उनके नीचे ही रहेंगे।जो नीच व ऊंच का मानदंड है वह सारे पिछड़े-दलित के लिए एक है अंतर केवल यही है कि समझदार लोगो ने ऐसा न विभाजन किया है कि हम इकट्ठा न हो सकें और खुद को किसी से तो श्रेष्ठ हैं यह भाव मन में रख लट्टू होते रहें।
        हजारों वर्ष की सामाजिक गुलामी को दूर करने का रास्ता सारे शोषितों में आपसी समन्यव स्थापित करना है जिसके लिए सबसे पहले हमें अपनी उच्चता का भाव त्यागना होगा।इसके बाद हमें धार्मिक आडंबरों के प्रति सचेत होना पड़ेगा।जब तक हम धार्मिक बंधनो और भाग्य-भगवान में अटके रहेंगे तब तक हमारा कोई कल्याण नही कर सकेगा।
        बाबा साहब डॉ भीम राव अम्बेडकर ने देश की आजादी के पूर्व व देश की आजादी के बाद अपने निर्वाण प्राप्ति तक दलित समाज को शिक्षित होने,संगठित होने और संघर्ष करने का सूत्र दिया।बाबा साहब ने आजादी के पहले महाड तालाब आंदोलन से लेकर मनुस्मृति फूंकने तक का अभियान चलाया।उन्होंने कांग्रेस की उस आजादी को बेमानी बताया जिसमे प्रभु जातियां तो अंग्रेजो से स्वतंत्र हो जा रही थीं पर अधिकारो से वंचित जातियां यथावत रह जा रही थीं।बाबा साहब ने अंग्रेजो से बहस कर भारत की सामाजिक स्थिति के आकलन हेतु "साइमन कमीशन" लाया पर पिछड़ी जातियों का वही जातीय श्रेष्ठता का भाव उनसे यह नारा लगवा दिया कि "साइमन कमीशन गो बैक" जबकि साइमन कमीशन इन पिछड़े-दलित वर्गों को अधिकार सम्पन्न बनाने की सिफारिशें  करने हेतु आया था।
       यह दलित-पिछडो के आपसी समन्यव का घनघोर अभाव का परिणाम रहा कि आजादी के पूर्व ही अम्बेडकर साहब के सद्प्रयासों से दलित समाज अंग्रेजी राज में ही अनेक सहूलियतें पा गया,पर पिछड़ा मुंह ताकता रह गया।गांधी जी जो वर्ण व्यवस्था के जबर्दस्त पोषक थे दलितों को दो वोट देने व लड़ने के अधिकार के विरुद्ध आमरण अनशन कर अम्बेडकर साहब को "पूना पैक्ट" करने को विवश कर दिए।यह विवशता भी पिछड़े वर्गों की कुम्भकर्णी निद्रा व जिस डाल पर बैठे हैं उसे ही काटने की प्रबृत्ति के कारण अम्बेडकर साहब के समक्ष आयी।
       पिछड़ी जातियों द्वारा अम्बेडकर साहब के आंदोलनो में कोई सहयोग न करना,दलितों के साथ प्रभु वर्ग से भी ज्यादा छुवाछूत का व्यवहार करना इन पिछड़ों के आज तक के पिछड़ेपन का कारण है जिस पर इनका ध्यान नही जा रहा है जबकि जिस दिन इन पिछड़े वर्गों को यह आभास हो गया कि वे भी गुलाम ही हैं,उसी दिन सारी परिस्थितियां बदल जाएंगी।बाबा साहब का यह कहना सोलह आने सत्य है कि "गुलाम को जिस दिन गुलामी का अहसास हो गया उसी दिन वह विद्रोह कर बैठेगा।"
           बाबा साहब डा अम्बेडकर को बहुत सारे पिछड़े लोग दोष देते हैं कि उन्होंने दलितों की तुलना में पिछडो के हित हेतु क्या किया?यही सवाल अहम है कि बाबा साहब ने पिछडो के हितार्थ क्या किया?बाबा साहब ने साइमन कमीशन लाया जिसमे पिछड़े वर्गों का भी कल्याण होना था लेकिन कांग्रेस के नेताओ ने आम-अवाम व पिछडो को समझा दिया कि साइमन कमीशन सबको चमार बनाने आ रहा है।जातीय अभिमान में चूर पिछडे वर्ग के लोग अपनी दुर्दशा भूल चमार बनने का विरोध करने लगे।यह देख बाबा साहब ठगे से रह गए।
          देश की आजादी के बाद जब बात सँविधान लिखने की आई तो सँविधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में बाबा साहब डॉ आंबेडकर ने अनुच्छेद 340 का प्राविधान पिछड़े वर्गों के लिए पहले किया जबकि अनुसूचित जातियों के लिए 341 व अनुसूचित जनजातियों के लिए 342 का प्राविधान बाद में किया।संवैधानिक अधिकार मिलने के बाद भी पिछड़ी जातियां सोई रहीं।
           देश का कानून मंत्री रहते हुए बाबा साहब डॉ अम्बेडकर ने लखनऊ के पिछड़ा वर्ग सम्मेलन में अपनी मनःस्थिति बयां करते हुये खुलेआम बोल दिया था कि "जिस दिन इस देश के दलित-पिछड़े एकजुट हो गए उस दिन पण्डित गोविंद बल्लभ पंत जैसे लोग इनके जूते की फीतियाँ बांधने में गर्व महसूस करेंगे।"बाबा साहब के उक्त कथन पर भारत की नेहरू सरकार ने पत्र व्यवहार भी किया कि वे कानून मंत्री रहते हुए ऐसा कैसे बोल गए?
         बाबा साहब अम्बेडकर जब तक जिंदा रहे उनके साथ पिछड़ी जातियां किसी आंदोलन में शामिल नही हुईं क्योकि कांग्रेस द्वारा रोपित विचार उनके अंदर तब भी पुष्पित-पल्लवित हो रहे थे कि अम्बेडकर साहब के साथ जाने का मतलब अछूत बनना है।
         सँविधान प्रदत्त अधिकारों के तहत पिछड़े वर्गों के लिए काका कालेलकर आयोग हो या मण्डल आयोग,सबका प्रितिरोध कांग्रेसी सत्ता ने किया क्योकि कांग्रेस हो या वर्तमान भाजपा ये इस देश के प्रभु वर्गों की हिमायती पार्टियां है।
          समाजवादी नेता डॉ लोहिया जो सारी जाति की महिलाओं को शामिल कर पिछड़ा कांसेप्ट पर बोलते हुए नारा दिए थे कि पिछड़ा पावें सौ ने साठ ने उन्नीस सौ साठ के दशक में यह प्रयत्न जरूर किया कि बाबा साहब अम्बेडकर व समाजवादी एक साथ हो इस देश के वंचितो की लड़ाई लड़ें पर उसी दरम्यान बाबा साहब की मौत हो गयी।
         उन्नीस सौ नब्बे के दशक में मान्यवर कांशीराम साहब ने "मण्डल कमीशन लागू करो,वरना कुर्सी खाली करो" के नारे के साथ देश भर में प्रदर्शन व रैलियां आयोजित की,दिल्ली में इस निमित्त विशाल रैली कांशीराम साहब ने किया।वीपी सिंह जी की सरकार बनी और आंशिक मण्डल कमीशन लागू हुवा लेकिन पिछड़े वर्गों की जो एकजुटता व अभियान होना चाहिये वह कहीं नजर नही आया।दलित समाज पिछड़े वर्गों के मसायल पर साथ आया लेकिन पिछड़े वर्ग के लोग अपने ही अधिकार के लिए कभी संगठित हो संघर्ष करने का इतिहास न रच सके।
        दलित समाज की सजगता से पिछड़े वर्ग के लोग सीख लें,ऐसा भी नही हो सका है जिस नाते पिछड़े वर्गों की सदैव ही हकमारी होती रही है।पिछड़ी जातियों का सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण कोर्ट ने लागू करने का फैसला कर दिया लेकिन उसमें आर्थिक आधार का प्राविधान"क्रीमी लेयर" जोड़ दिया जो कहीं भी सँविधान में नही है लेकिन पिछड़े आंदोलित न हो सके जबकि वहीं कोर्ट द्वारा एससी-एसटी खत्म करने पर दलित समाज दर्जनों की संख्या में शहादत दे कर इस अधिकार को सन्सद से पुनः लागू करवा लिया।13 प्वाइंट रोस्टर पर भी पिछड़े वर्ग के लोग सोए रहे लेकिन दलित समाज चैतन्य हो 100 प्वाइंट रोस्टर लागू करवा लिया।इस एससी-एसटी ऐक्ट व 13 प्वाइंट रोस्टर पर पिछड़े वर्गों में केवल बिहार के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव जी ने सकारात्मक सहयोग किया।
        वर्तमान दौर बहुत दुरूह है।सँविधान,आरक्षण,सामाजिक समता की नीति खतरे में हैं।मनुवादी,यथास्थितिवादी शक्तियां सर उठाने लगी हैं।आरक्षण को खत्म करने हेतु सरकारी नौकरियां खत्म की जा रही हैं।लाभ के उपक्रमो का भी प्राइवेटाइजेशन किया जाने लगा है।आउट सोर्सिंग से काम करने हेतु अपने लोगो की भर्तियों का कार्य सरकारी दल कर रहे हैं जिसमे आरक्षण लागू नही है।इन आउटसोर्सिंग से नियुक्त लोगो को ही बाद में रेगुलराइज करने की सँविधान विरोधी मंशा को क्रियान्वित किया जाना है।जातियों के नाम पर देश भर में माव लीचिंग शुरू है ऐसे में अब निहायत ही जरूरी हो चला है कि देश का दलित-पिछड़ा बुद्धिजीवी इन दोनों समुदायों को एकजुट करने हेतु पहल करे।
      मुझे आभास है कि यह मुहिम कठिन है पर आज यही समय की मांग है कि देश का सम्पूर्ण बहुजन समाज इकट्ठा हो और समाज हित मे वर्गीय चेतना विकसित करने के लिए अपनी जातिगत कुंठा को निकाल फेंक वर्गीय संगठन तैयार करे अन्यथा आगे का दौर और संकटपूर्ण होगा।
-चंद्रभूषण सिंह यादव
प्रधान संपादक-"यादव शक्ति"/कंट्रीब्यूटिंग एडिटर-"सोशलिस्ट फ़ैक्टर"

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