न्यूज़, ब्लॉग , चर्चित व्यक्तिव , पर्यटन और सामाज और धर्म कर्म की खबरे देखो दुनिया लेकिन हमारे भाटापारा के नजरिये से ...........

शिवनाथ नदी के बीचों-बीच पर्यटन की अनूठी जगह मदकू द्वीप दो धर्म और आस्था का संगम स्थल

अपना भाटापारा देखो दुनिया लेकिन हमारे भाटापारा के नजरिये से ............

परम प्रेम की परिणिति काम-क्रीडा को परिलक्षित करती छत्तीसगढ का खजुराहो भोरमदेव मंदिर।

अपना भाटापारा देखो दुनिया लेकिन हमारे भाटापारा के नजरिये से ............

शिवनाथ नदी के बीचों-बीच पर्यटन की अनूठी जगह मदकू द्वीप दो धर्म और आस्था का संगम स्थल

अपना भाटापारा देखो दुनिया लेकिन हमारे भाटापारा के नजरिये से ............

शिवरीनारायण का मंदिर माता शबरी का आश्रम छत्तीसगढ़-इतिहास के पन्नो में

अपना भाटापारा देखो दुनिया लेकिन हमारे भाटापारा के नजरिये से ............

प्रेम का लाल प्रतीक लक्ष्मण मंदिर...........

अपना भाटापारा देखो दुनिया लेकिन हमारे भाटापारा के नजरिये से ............

ताला की विलक्षण प्रतिमा-देवरानी जेठानी मंदिर

अपना भाटापारा देखो दुनिया लेकिन हमारे भाटापारा के नजरिये से ............

दयाशंकर: रंगमंच की दुनिया से हमर भाटापारा के उभरते कलाकार रवि शर्मा द्वारा प्रस्तुत नाटक दयाशंकर की डायरी का मंचन रायपुर में 2 नवंबर से।

दयाशंकर एक झन अकेल्ला मनखे हे। ओकर जिनगी ह भोरहा मा कटत हे। वास्तविक के दुनिया से ओकर दुरिहा ले भी कोनो वास्ता नई हे। वैइसने जैसे अब्बड झन मनखें मन अपन मन भितर सब सोच लेथें कोन जनी अपन आप ला का से का समझ लेथें। बड़े आदमी बने के अउ बने सुन्दर असन टुरी संग बिहाव करे के सपना कौन नई देखय? अंतर सिरिफ अतके हे कि कोनों कोनो ल जल्दी अपन हकीकत ह अपन परिस्थिति समझ आ जथे जौऊन नई समझ पाय ओकर गति दयाशंकर सही हो जथे।
'दयाशंकर' निच्चट भोरहा मा जियथे। वो बेचारा हमर छत्तीसगढ़ के एक छोटे से गाँव ले मुंम्बई फिलिम के हीरो बने बर गेहे। उहां ओला जुनियर आर्टिस्ट के काम मिलथे जेला दयाशंकर ये कहिके मना कर देथे 'भाई मछरी के आँखी ला देखना हे तो पुछी ला काबर देखना। कल कहु कोनो हिरोईन मोला देख के मना कर दिहि कि ये तो जुनियर आर्टिस्ट हे मै एकर संग काम नई करव तब मैं कैइसे करहूँ। राहन दे मोर बाप मोला अपन जीवन नष्ट नई करना हे।' 
अपन किस्मत के मौका ला अगरोत अगोरत दयाशंकर ला एक मामूली कलर्क के नौकरी करे ला पढ़ जाथे। लेकिन अपन जिन्दगी के सच्चाई ले दयाशंकर समझौता नई कर पाइस और अपन जिन्दगी के आभाव और अपन परिवार के समाजिक जिम्मेदारी मा बंधावत चले जाथे। दयाशंकर अपन बर बने बड़े बड़े सपना देखत रिथे। और अपन सपना ला सही मानेला धर लेथे अउ धीरे-धीरे हार मान जथे। जब वो होस मा आथे तब वो अपन असल जिन्दगी मा लहुटना  चाहथे त अपन आप ला पागल खाना मा पाथे। पागलखाना ले निकलना चाहथे।
का दयाशंकर सही मा पागल हे? 
का हम सब झन अइसनेच अपन असफलता ले भाग के अपन अपन कल्पना के दुनिया भीतरी सहारा नई खोंजन? जौउन मनखे मन अपन असफलता ले नई सीखें समझौता नई कर पाथें ओकर मन संग का हो सकत हे देखे बर आप ला एक बार 'दयाशंकर' जरूर देखना चाही।  अपन सुविधानुसार 'जनमंच' सड्डु अम्बुजा माल के पाछु आवव देखेबर, भुलाहू झन रे भाई।


संगवारी हो दयाशंकर एक अइसे मनखे के कहानी हे जेन बहुत अकन पईसा कमाना चाहथे हिरो बने बर बम्बई जाथे बड़े आदमी बने के सपना देखथे बने असन बडे बाप के बेटी संग बिहाव करे के सपना देखथे अउ धीरे-धीरे असल जिंदगी के उतार चढ़ाव म मामूली से 7-8हजार के नौकरी करत-करत अपन आप ला बहुत महान समझे ल धर लेथे अपन बाप अउ बहिनी के मरे के बाद पागल हो जथे।
त दयाशंकर काबर पगला जथे?
ओकर बहिनी अउ ओकर बाबू  कैसे मर  जथे?  हमर आस पास भी बहुत झन दयाशंकर हे वो कैसे? 
 वोला  जाने बर आपला एक बार 90मिनट समय निकाल के दयाशंकर देखेला परही  त 2 नवम्बर से 7नवम्बर मंझनिया 1 बजे अउ संझा 7 बजे 
 अंबुजा मॉल के पाछु म जनमंच मा आना हे आपमन के अगोरा रिही काका 💐🙏🏼
टिकट बर संपर्क करहु 💐
9425643166
9826153672
Share:

करवा चौथ महात्म्य| पूजन सामग्री और व्रत की विधि |व्रत कथा| हिन्दू संस्कृति में महत्त्व | 17अक्टूबर 2019 विशेष

करवा चौथ : 17अक्टूबर 2019 विशेष

〰️🔸〰️🔸🔸〰️🔸〰️
करवा चौथ व्रत का हिन्दू संस्कृति में विशेष महत्त्व है। इस दिन पति की लम्बी उम्र के पत्नियां पूर्ण श्रद्धा से निर्जला व्रत रखती है। 

सुहागन महिलाओं के लिए चौथ महत्वपूर्ण है। इसलिए इस दिन पति की लंबी उम्र के साथ संतान सुख की मनोकामना भी पूर्ण हो सकती है।
www.bhatapara.in

करवा चौथ महात्म्य

〰️〰️🔸🔸〰️〰️
छांदोग्य उपनिषद् के अनुसार चंद्रमा में पुरुष रूपी ब्रह्मा की उपासना करने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। इससे जीवन में किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं होता है। साथ ही साथ इससे लंबी और पूर्ण आयु की प्राप्ति होती है। करवा चौथ के व्रत में शिव, पार्वती, कार्तिकेय, गणेश तथा चंद्रमा का पूजन करना चाहिए। चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अघ्र्य देकर पूजा होती है। पूजा के बाद मिट्टी के करवे में चावल,उड़द की दाल, सुहाग की सामग्री रखकर सास अथवा सास के समकक्ष किसी सुहागिन के पांव छूकर सुहाग सामग्री भेंट करनी चाहिए।

महाभारत से संबंधित पौराणिक कथा के अनुसार पांडव पुत्र अर्जुन तपस्या करने नीलगिरी पर्वत पर चले जाते हैं। दूसरी ओर बाकी पांडवों पर कई प्रकार के संकट आन पड़ते हैं। द्रौपदी भगवान श्रीकृष्ण से उपाय पूछती हैं। वह कहते हैं कि यदि वह कार्तिक कृष्ण चतुर्थी के दिन करवाचौथ का व्रत करें तो इन सभी संकटों से मुक्ति मिल सकती है। द्रौपदी विधि विधान सहित करवाचौथ का व्रत रखती है जिससे उनके समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं। इस प्रकार की कथाओं से करवा चौथ का महत्त्व हम सबके सामने आ जाता है।

महत्त्व के बाद बात आती है कि करवा चौथ की पूजा विधि क्या है? किसी भी व्रत में पूजन विधि का बहुत महत्त्व होता है। अगर सही विधि पूर्वक पूजा नहीं की जाती है तो इससे पूरा फल प्राप्त नहीं हो पाता है।

चौथ की पूजन सामग्री और व्रत की विधि   

〰️🔸〰️🔸🔸🔸〰️🔸〰️

करवा चौथ पर्व की पूजन सामग्री👇


कुंकुम, शहद, अगरबत्ती, पुष्प, कच्चा दूध, शक्कर, शुद्ध घी, दही, मेंहदी, मिठाई, गंगाजल, चंदन, चावल, सिन्दूर, मेंहदी, महावर, कंघा, बिंदी, चुनरी, चूड़ी, बिछुआ, मिट्टी का टोंटीदार करवा व ढक्कन, दीपक, रुई, कपूर, गेहूँ, शक्कर का बूरा, हल्दी, पानी का लोटा, गौरी बनाने के लिए पीली मिट्टी, लकड़ी का आसन, छलनी, आठ पूरियों की अठावरी, हलुआ, दक्षिणा के लिए पैसे।

सम्पूर्ण सामग्री को एक दिन पहले ही एकत्रित कर लें। 


व्रत वाले दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर स्नान कर स्वच्छ कपड़े पहन लें तथा शृंगार भी कर लें। इस अवसर पर करवा की पूजा-आराधना कर उसके साथ शिव-पार्वती की पूजा का  विधान है क्योंकि माता पार्वती ने कठिन तपस्या करके शिवजी को प्राप्त कर अखंड सौभाग्य प्राप्त किया था इसलिए शिव-पार्वती की पूजा की जाती है। करवा चौथ के दिन चंद्रमा की पूजा का धार्मिक और ज्योतिष दोनों ही दृष्टि से महत्व है। व्रत के दिन प्रात: स्नानादि करने के पश्चात यह संकल्प बोल कर करवा चौथ व्रत का आरंभ करें।

करवा चौथ पूजन विधि

〰️🔸〰️🔸〰️
प्रात: काल में नित्यकर्म से निवृ्त होकर संकल्प लें और व्रत आरंभ करें।

व्रत के दिन निर्जला रहे यानि जलपान ना करें।

व्रत के दिन प्रातः स्नानादि करने के पश्चात यह संकल्प बोलकर करवा चौथ व्रत का आरंभ करें-
प्रातः पूजा के समय इस मन्त्र के जप से व्रत प्रारंभ किया जाता है-
 'मम सुखसौभाग्य पुत्रपौत्रादि सुस्थिर श्री प्राप्तये करक चतुर्थी व्रतमहं करिष्ये।'

अथवा👇

ॐ शिवायै नमः' से पार्वती का, 
'ॐ नमः शिवाय' से शिव का, 
'ॐ षण्मुखाय नमः' से स्वामी कार्तिकेय का, 'ॐ गणेशाय नमः' से गणेश का तथा 
'ॐ सोमाय नमः' से चंद्रमा का पूजन करें।

शाम के समय, माँ पार्वती की प्रतिमा की गोद में श्रीगणेश को विराजमान कर उन्हें बालू अथवा सफेद मिट्टी की वेदी अथवा लकड़ी के आसार पर शिव-पार्वती, स्वामी कार्तिकेय, गणेश एवं चंद्रमा की स्थापना करें। मूर्ति के अभाव में सुपारी पर नाड़ा बाँधकर देवता की भावना करके स्थापित करें। पश्चात माँ पार्वती का सुहाग सामग्री आदि से श्रृंगार करें।

भगवान शिव और माँ पार्वती की आराधना करें और कोरे करवे में पानी भरकर पूजा करें। एक लोटा, एक वस्त्र व एक विशेष करवा दक्षिणा के रूप में अर्पित करें।

सौभाग्यवती स्त्रियां पूरे दिन का व्रत कर व्रत की कथा का श्रवण करें। चंद्रोदय के बाद चाँद को अर्घ्य देकर अपने पति के हाथ से जल एवं मिष्ठान खा कर व्रत खोले।

करवा चौथ प्रथम कथा 

〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️

बहुत समय पहले की बात है, एक साहूकार के सात बेटे और उनकी एक बहन करवा थी। सभी सातों भाई अपनी बहन से बहुत प्यार करते थे। यहाँ तक कि वे पहले उसे खाना खिलाते और बाद में स्वयं खाते थे। एक बार उनकी बहन ससुराल से मायके आई हुई थी।

शाम को भाई जब अपना व्यापार-व्यवसाय बंद कर घर आए तो देखा उनकी बहन बहुत व्याकुल थी। सभी भाई खाना खाने बैठे और अपनी बहन से भी खाने का आग्रह करने लगे, लेकिन बहन ने बताया कि उसका आज करवा चौथ का निर्जल व्रत है और वह खाना सिर्फ चंद्रमा को देखकर उसे अर्घ्‍य देकर ही खा सकती है। चूँकि चंद्रमा अभी तक नहीं निकला है, इसलिए वह भूख-प्यास से व्याकुल हो उठी है।
सबसे छोटे भाई को अपनी बहन की हालत देखी नहीं जाती और वह दूर पीपल के पेड़ पर एक दीपक जलाकर चलनी की ओट में रख देता है। दूर से देखने पर वह ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे चतुर्थी का चाँद उदित हो रहा हो।
इसके बाद भाई अपनी बहन को बताता है कि चाँद निकल आया है, तुम उसे अर्घ्य देने के बाद भोजन कर सकती हो। बहन खुशी के मारे सीढ़ियों पर चढ़कर चाँद को देखती है, उसे अर्घ्‍य देकर खाना खाने बैठ जाती है।
वह पहला टुकड़ा मुँह में डालती है तो उसे छींक आ जाती है। दूसरा टुकड़ा डालती है तो उसमें बाल निकल आता है और जैसे ही तीसरा टुकड़ा मुँह में डालने की कोशिश करती है तो उसके पति की मृत्यु का समाचार उसे मिलता है। वह बौखला जाती है।

उसकी भाभी उसे सच्चाई से अवगत कराती है कि उसके साथ ऐसा क्यों हुआ। करवा चौथ का व्रत गलत तरीके से टूटने के कारण देवता उससे नाराज हो गए हैं और उन्होंने ऐसा किया है।
सच्चाई जानने के बाद करवा निश्चय करती है कि वह अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं होने देगी और अपने सतीत्व से उन्हें पुनर्जीवन दिलाकर रहेगी। वह पूरे एक साल तक अपने पति के शव के पास बैठी रहती है। उसकी देखभाल करती है। उसके ऊपर उगने वाली सूईनुमा घास को वह एकत्रित करती जाती है।

एक साल बाद फिर करवा चौथ का दिन आता है। उसकी सभी भाभियाँ करवा चौथ का व्रत रखती हैं। जब भाभियाँ उससे आशीर्वाद लेने आती हैं तो वह प्रत्येक भाभी से 'यम सूई ले लो, पिय सूई दे दो, मुझे भी अपनी जैसी सुहागिन बना दो' ऐसा आग्रह करती है, लेकिन हर बार भाभी उसे अगली भाभी से आग्रह करने का कह चली जाती है।
इस प्रकार जब छठे नंबर की भाभी आती है तो करवा उससे भी यही बात दोहराती है। यह भाभी उसे बताती है कि चूँकि सबसे छोटे भाई की वजह से उसका व्रत टूटा था अतः उसकी पत्नी में ही शक्ति है कि वह तुम्हारे पति को दोबारा जीवित कर सकती है, इसलिए जब वह आए तो तुम उसे पकड़ लेना और जब तक वह तुम्हारे पति को जिंदा न कर दे, उसे नहीं छोड़ना। ऐसा कह के वह चली जाती है।

सबसे अंत में छोटी भाभी आती है। करवा उनसे भी सुहागिन बनने का आग्रह करती है, लेकिन वह टालमटोली करने लगती है। इसे देख करवा उन्हें जोर से पकड़ लेती है और अपने सुहाग को जिंदा करने के लिए कहती है। भाभी उससे छुड़ाने के लिए नोचती है, खसोटती है, लेकिन करवा नहीं छोड़ती है।

अंत में उसकी तपस्या को देख भाभी पसीज जाती है और अपनी छोटी अँगुली को चीरकर उसमें से अमृत उसके पति के मुँह में डाल देती है। करवा का पति तुरंत श्रीगणेश-श्रीगणेश कहता हुआ उठ बैठता है। इस प्रकार प्रभु कृपा से उसकी छोटी भाभी के माध्यम से करवा को अपना सुहाग वापस मिल जाता है। हे श्री गणेश माँ गौरी जिस प्रकार करवा को चिर सुहागन का वरदान आपसे मिला है, वैसा ही सब सुहागिनों को मिले।

करवाचौथ द्वितीय कथा 

〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️

इस कथा का सार यह है कि शाकप्रस्थपुर वेदधर्मा ब्राह्मण की विवाहिता पुत्री वीरवती ने करवा चौथ का व्रत किया था। नियमानुसार उसे चंद्रोदय के बाद भोजन करना था, परंतु उससे भूख नहीं सही गई और वह व्याकुल हो उठी। उसके भाइयों से अपनी बहन की व्याकुलता देखी नहीं गई और उन्होंने पीपल की आड़ में आतिशबाजी का सुंदर प्रकाश फैलाकर चंद्रोदय दिखा दिया और वीरवती को भोजन करा दिया।

परिणाम यह हुआ कि उसका पति तत्काल अदृश्य हो गया। अधीर वीरवती ने बारह महीने तक प्रत्येक चतुर्थी को व्रत रखा और करवा चौथ के दिन उसकी तपस्या से उसका पति पुनः प्राप्त हो गया।

करवा चौथ तृतीय कथा 

〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️

एक समय की बात है कि एक करवा नाम की पतिव्रता स्त्री अपने पति के साथ नदी के किनारे के गाँव में रहती थी। एक दिन उसका पति नदी में स्नान करने गया। स्नान करते समय वहाँ एक मगर ने उसका पैर पकड़ लिया। वह मनुष्य करवा-करवा कह के अपनी पत्नी को पुकारने लगा।

उसकी आवाज सुनकर उसकी पत्नी करवा भागी चली आई और आकर मगर को कच्चे धागे से बाँध दिया। मगर को बाँधकर यमराज के यहाँ पहुँची और यमराज से कहने लगी- हे भगवन! मगर ने मेरे पति का पैर पकड़ लिया है। उस मगर को पैर पकड़ने के अपराध में आप अपने बल से नरक में ले जाओ।
यमराज बोले- अभी मगर की आयु शेष है, अतः मैं उसे नहीं मार सकता। इस पर करवा बोली, अगर आप ऐसा नहीं करोगे तो मैं आप को श्राप देकर नष्ट कर दूँगी। सुनकर यमराज डर गए और उस पतिव्रता करवा के साथ आकर मगर को यमपुरी भेज दिया और करवा के पति को दीर्घायु दी। हे करवा माता! जैसे तुमने अपने पति की रक्षा की, वैसे सबके पतियों की रक्षा करना।

करवाचौथ चौथी कथा 

〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️

एक बार पांडु पुत्र अर्जुन तपस्या करने नीलगिरी नामक पर्वत पर गए। इधर द्रोपदी बहुत परेशान थीं। उनकी कोई खबर न मिलने पर उन्होंने कृष्ण भगवान का ध्यान किया और अपनी चिंता व्यक्त की। कृष्ण भगवान ने कहा- बहना, इसी तरह का प्रश्न एक बार माता पार्वती ने शंकरजी से किया था।

पूजन कर चंद्रमा को अर्घ्‍य देकर फिर भोजन ग्रहण किया जाता है। सोने, चाँदी या मिट्टी के करवे का आपस में आदान-प्रदान किया जाता है, जो आपसी प्रेम-भाव को बढ़ाता है। पूजन करने के बाद महिलाएँ अपने सास-ससुर एवं बड़ों को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लेती हैं।

तब शंकरजी ने माता पार्वती को करवा चौथ का व्रत बतलाया। इस व्रत को करने से स्त्रियाँ अपने सुहाग की रक्षा हर आने वाले संकट से वैसे ही कर सकती हैं जैसे एक ब्राह्मण ने की थी। प्राचीनकाल में एक ब्राह्मण था। उसके चार लड़के एवं एक गुणवती लड़की थी।

एक बार लड़की मायके में थी, तब करवा चौथ का व्रत पड़ा। उसने व्रत को विधिपूर्वक किया। पूरे दिन निर्जला रही। कुछ खाया-पीया नहीं, पर उसके चारों भाई परेशान थे कि बहन को प्यास लगी होगी, भूख लगी होगी, पर बहन चंद्रोदय के बाद ही जल ग्रहण करेगी।

भाइयों से न रहा गया, उन्होंने शाम होते ही बहन को बनावटी चंद्रोदय दिखा दिया। एक भाई पीपल की पेड़ पर छलनी लेकर चढ़ गया और दीपक जलाकर छलनी से रोशनी उत्पन्न कर दी। तभी दूसरे भाई ने नीचे से बहन को आवाज दी- देखो बहन, चंद्रमा निकल आया है, पूजन कर भोजन ग्रहण करो। बहन ने भोजन ग्रहण किया।

भोजन ग्रहण करते ही उसके पति की मृत्यु हो गई। अब वह दुःखी हो विलाप करने लगी, तभी वहाँ से रानी इंद्राणी निकल रही थीं। उनसे उसका दुःख न देखा गया। ब्राह्मण कन्या ने उनके पैर पकड़ लिए और अपने दुःख का कारण पूछा, तब इंद्राणी ने बताया- तूने बिना चंद्र दर्शन किए करवा चौथ का व्रत तोड़ दिया इसलिए यह कष्ट मिला।

अब तू वर्ष भर की चौथ का व्रत नियमपूर्वक करना तो तेरा पति जीवित हो जाएगा। उसने इंद्राणी के कहे अनुसार चौथ व्रत किया तो पुनः सौभाग्यवती हो गई। इसलिए प्रत्येक स्त्री को अपने पति की दीर्घायु के लिए यह व्रत करना चाहिए। द्रोपदी ने यह व्रत किया और अर्जुन सकुशल मनोवांछित फल प्राप्त कर वापस लौट आए। तभी से हिन्दू महिलाएँ अपने अखंड सुहाग के लिए करवा चौथ व्रत करती हैं।
सायं काल में चंद्रमा के दर्शन करने के बाद ही पति द्वारा अन्न एवं जल ग्रहण करें।

पति, सास-ससुर सब का आशीर्वाद लेकर व्रत को समाप्त करें।

पूजा एवं चन्द्र को अर्घ्य देने का मुहूर्त

〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️

17 अक्टूबर के दिन चंद्रोदय का समय 
20:50 मिनट पर
प्राचीन मान्यताओं के अनुसार करवा चौथ के दिन शाम के समय चन्द्रमा को अर्घ्य देकर ही व्रत खोला जाता है। 
🕉🐚⚔🚩🌞🇮🇳⚔🌷🙏🏻

                        प्रस्तुति
             "पं.खेमेश्वर पुरी गोस्वामी"
            धार्मिक प्रवक्ता-ओज कवि
          प्रदेश संगठन मंत्री एवं प्रवक्ता
   अंतरराष्ट्रीय युवा हिंदू वाहिनी छत्तीसगढ़
      ८१२००३२८३४-/-७८२८६५७०५७
Share:

बिलासपुर -रायपुर लाइन मे लॉन्ग लूप का कार्य होने के कारण 8 दिनों तक कुछ ट्रेनों का परिचालन प्रभावित

हथबंद स्टेशन पर बिलासपुर -रायपुर लाइन मे लॉन्ग लूप का कार्य होने के कारण 8 दिनों तक कुछ ट्रेनों का परिचालन प्रभावित

भाटापारा ;-
          दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे रायपुर रेल मंडल के हथबंद स्टेशन पर बिलासपुर रायपुर लाइन इलेक्ट्रिफिकेशन ए रूट सेक्शन मे  प्री एनआई / एनआई कमिश्निंग ऑफ लॉन्ग लूप का कार्य होने के कारण कुछ ट्रेनों का परिचालन प्रभावित रहेगा ।  हथबंद मे लॉन्ग लूप बनने से रायपुर मंडल मे ट्रेनों की समयबद्धता कायम रखने, ट्रेनों का परिचालन ओर बेहतर किया जा सकेगा ।
जिन ट्रेनों को इस दौरान रद्द किया गया है उसमे


1. 68746 रायपुर –गेवरारोड मेमू 13 अक्टूबर से 20 अक्टूबर 2019 तक 08 दिनों  के लिये रद्द रहेगी
2. 68745 गेवरारोड- रायपुर मेमू 14 अक्टूबर से 21 अक्टूबर 2019 तक 08 दिनों  के लिये रद्द रहेगी
3. 58204 रायपुर- गेवरा रोड पैसेंजर 13 अक्टूबर से 20 अक्टूबर 2019 तक 08 दिनों  के लिये रद्द रहेगी
4. 58203 गेवरा रोड -रायपुर 14 अक्टूबर से 21 अक्टूबर 2019 तक 08 दिनों  के लिये रद्द रहेगी
5. 12856 इतवारी-बिलासपुर इंटरसिटी एक्सप्रेस 14 अक्टूबर से 20 अक्टूबर 2019 तक 07 दिनों  के लिये रद्द रहेगी
6. 12855 बिलासपुर -इतवारी इंटरसिटी एक्सप्रेस 14 अक्टूबर से 20 अक्टूबर 2019 तक 07 दिनों  के लिये रद्द रहेगी
7. 22886 टाटा- एलटीटी एक्सप्रेस 13 अक्टूबर एवं 17 अक्टूबर 2019 तक 02 दिनों  के लिये रद्द रहेगी
8. 22885 एलटीटी -टाटा एक्सप्रेस 15 अक्टूबर एवं 19 अक्टूबर 2019 तक 02 दिनों  के लिये रद्द रहेगी
9. 17005 हैदराबाद -रक्सौल एक्सप्रेस 17 अक्टूबर 2019  को  01 दिन  के लिये रद्द रहेगी
10. 17006 रक्सौल- हैदराबाद एक्सप्रेस 20 अक्टूबर 2019  को  01 दिन  के लिये रद्द रहेगी
11. 17007 सिकंदराबाद -दरभंगा एक्सप्रेस 15 अक्टूबर एवं 19 अक्टूबर 2019 तक 02 दिनों  के लिये रद्द रहेगी
12. 17008 दरभंगा -सिकंदराबाद एक्सप्रेस 15 अक्टूबर एवं 18 अक्टूबर 2019 तक 02 दिनों  के लिये रद्द रहेगी
13. 07009 सिकंदराबाद -बरौनी स्पेशल 13 अक्टूबर एवं 20 अक्टूबर 2019 तक 02 दिनों  के लिये रद्द रहेगी
14. 07010 बरौनी -सिकंदराबाद स्पेशल 16 अक्टूबर एवं 23 अक्टूबर 2019 तक 02 दिनों  के लिये रद्द रहेगी

वही गंतव्य से पहले ही समाप्त होने वाली ट्रेनें है-

1. गाड़ी संख्या 15231 बरौनी गोंदिया एक्सप्रेस 13 अक्टूबर से 19 अक्टूबर 2019 तक उसलापुर में समाप्त कर दी जाएगी ।  गाड़ी संख्या 15232 गोंदिया बरौनी एक्सप्रेस दिनांक 15 अक्टूबर  से 21 अक्टूबर 2019 तक उसलापुर से बरौनी के लिए रवाना होगी । 15231 / 15232 गोंदिया -बरौनी -गोंदिया एक्सप्रेस, उसलापुर –गोंदिया- उसलापुर के मध्य 14 अक्टूबर से 20 अक्टूबर तक रद्द रहेगी।

2. गाड़ी संख्या 15159 छपरा -दुर्ग सारनाथ एक्सप्रेस दिनांक 13 अक्टूबर से 19 अक्टूबर तक बिलासपुर में ही समाप्त कर दी जाएगी । गाड़ी संख्या 15160 दुर्ग छपरा सारनाथ एक्सप्रेस दिनांक 14 अक्टूबर से 20 अक्टूबर तक बिलासपुर से छपरा के लिए रवाना की जाएगी । गाड़ी संख्या 15159 / 15160 छपरा -दुर्ग -छपरा सारनाथ एक्सप्रेस बिलासपुर-दुर्ग- बिलासपुर के मध्य दिनांक 14 अक्टूबर से 20 अक्टूबर तक रद्द रहेगी ।

3. गाड़ी संख्या 13288 राजेंद्रनगर - दुर्ग साउथ बिहार एक्सप्रेस दिनांक 12 अक्टूबर से 18 अक्टूबर तक बिलासपुर में ही समाप्त कर दी जाएगी । गाड़ी संख्या 13287 दुर्ग राजेंद्र नगर साउथ बिहार एक्सप्रेस दिनांक 14 अक्टूबर से 20 अक्टूबर तक बिलासपुर से ही राजेंद्र नगर के लिए रवाना की जाएगी ।     गाड़ी संख्या 13288 राजेंद्रनगर- दुर्ग साउथ बिहार एक्सप्रेस दिनांक 13 अक्टूबर से 19 अक्टूबर तक बिलासपुर- दुर्ग- के मध्य रद्द रहेगी । 13287 दुर्ग -राजेंद्रनगर साउथ बिहार एक्सप्रेस दिनांक 14 अक्टूबर से 20 अक्टूबर तक दुर्ग- बिलासपुर के मध्य रद्द रहेगी ।

4. गाड़ी संख्या 18242 अंबिकापुर - दुर्ग एक्सप्रेस कम पैसेंजर दिनांक 13 अक्टूबर से 19 अक्टूबर तक उसलापुर में ही समाप्त कर दी जाएगी । गाड़ी संख्या 18241 दुर्ग - अंबिकापुर एक्सप्रेस कम पैसेंजर दिनांक 15 अक्टूबर से 21 अक्टूबर तक उसलापुर से अंबिकापुर के लिए रवाना होगी । गाड़ी संख्या 18242 / 18241 अंबिकापुर-दुर्ग-अंबिकापुर एक्सप्रेस कम पैसेंजर दिनांक 14 अक्टूबर से 20 अक्टूबर तक दुर्ग ‌-उसलापुर -दुर्ग के मध्य रद्द रहेगी ।

5. गाड़ी संख्या 17482 तिरुपति बिलासपुर एक्सप्रेस दिनांक 13 अक्टूबर और  19  अक्टूबर को  रायपुर में ही समाप्त कर दी जाएगी । गाड़ी संख्या 17481 बिलासपुर - तिरुपति एक्सप्रेस दिनांक 15 अक्टूबर और 19 अक्टूबर को रायपुर से तिरुपति के लिए रवाना की जाएगी।                   गाड़ी संख्या 17481 दिनांक 15 अक्टूबर और 19 अक्टूबर को बिलासपुर - रायपुर के मध्य रद्द रहेगी । गाड़ी संख्या 17482 दिनांक 14 अक्टूबर और 18 अक्टूबर को रायपुर- बिलासपुर के मध्य रद्द रहेगी ।

6. गाड़ी संख्या 22939 हापा- बिलासपुर एक्सप्रेस 15 अक्टूबर 2019 को हापा से रवाना होने वाली  दिनांक 17 अक्टूबर, 2019 को रायपुर में समाप्त कर दी जाएगी । गाड़ी संख्या 22940 बिलासपुर हापा एक्सप्रेस दिनांक 17 अक्टूबर 2019 को रायपुर से हापा रवाना की जाएगी । 22939/ 22940 हापा- बिलासपुर- हापा एक्सप्रेस 17 अक्टूबर 2019 को रायपुर -बिलासपुर -रायपुर के मध्य रद्द रहेगी ।

7. गाड़ी संख्या 12535 लखनऊ- रायपुर गरीबरथ एक्सप्रेस 14 अक्टूबर एवं 17 अक्टूबर को लखनऊ से रवाना होने वाली गरीब रथ एक्सप्रेस को 15 एवं 18 अक्टूबर को उसलापुर में समाप्त कर दिया जाएगा । गाड़ी संख्या 12536 रायपुर- लखनऊ गरीबरथ एक्सप्रेस को दिनांक 15 एवं 18 अक्टूबर 2019 को उसलापुर से लखनऊ के लिए रवाना किया जाएगा । यह गाड़ी 12535 /12536  दिनांक 15 एवं 18 अक्टूबर को रायपुर- उसलापुर- रायपुर के मध्य रद्द रहेगी ।

8. गाड़ी संख्या 58111 टाटा- इतवारी पैसेंजर दिनांक 13 अक्टूबर से 19 अक्टूबर तक बिलासपुर में समाप्त कर दी जाएगी । गाड़ी संख्या 58112 इतवारी - टाटा पैसेंजर दिनांक 14 अक्टूबर से 20 अक्टूबर तक बिलासपुर से टाटा नगर के लिए रवाना कर दी जाएगी । 58112 इतवारी - टाटा पैसेंजर दिनांक 13 अक्टूबर से 19 अक्टूबर तक इतवारी -बिलासपुर के मध्य रदद रहेगी । 58111 टाटा- इतवारी पैसेंजर 14 अक्टूबर से 19 अक्टूबर तक बिलासपुर इतवारी के मध्य रद्द रहेगी

9. गाड़ी संख्या 58117 झारसुगुड़ा-गोंदिया पैसेंजर दिनांक 14 अक्टूबर से 20 अक्टूबर तक बिलासपुर में समाप्त कर दी जाएगी । गाड़ी संख्या 58118 गोंदिया - झारसुगुड़ा पैसेंजर दिनांक 14 से 20 अक्टूबर तक बिलासपुर से झारसुगुड़ा के लिए रवाना की जाएगी । गाड़ी संख्या 58117 / 58118 झारसुगुड़ा- गोंदिया- झारसुगुड़ा पैसेंजर दिनांक 14 अक्टूबर से 20 अक्टूबर 2019 तक गोंदिया –बिलासपुर- गोंदिया के मध्य रद्द रहेगी ।
इस बीच कुछ ट्रेनों को
रीशेड्यूलिंग किया गया है जिसमे
          
1. गाड़ियां गाड़ी संख्या 18801 / 18803 कोरबा – रायपुर- कोरबा एक्सप्रेस कोरबा से 1 घंटे रीशेड्यूल की जाएगी और बिलासपुर- रायपुर के मध्य पैसेंजर के रूप में दिनांक 14 अक्टूबर से 21 अक्टूबर तक चलाई जाएगी ।
2. गाड़ी संख्या 18802  / 18804   रायपुर –कोरबा- रायपुर एक्सप्रेस रायपुर में 20 मिनट रीशेड्यूल की जाएगी एवं रायपुर-  बिलासपुर के मध्य 13 अक्टूबर से 20 अक्टूबर तक पैसेंजर के रूप में चलाई जाएगी । 
अन्य
1. गाड़ी संख्या 18238 अमृतसर- बिलासपुर छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस रायपुर- बिलासपुर के मध्य दिनांक 14 अक्टूबर से 20 अक्टूबर तक पैसेंजर के रूप में चलाई जाएगी ।

2. गाड़ी संख्या 18518  विशाखापट्टनम- कोरबा एक्सप्रेस रायपुर - बिलासपुर के मध्य 14 अक्टूबर से 20 अक्टूबर तक पैसेंजर के रूप में चलाई जाएगी ।

       यात्रियों की असुविधा के लिए रेल प्रशासन खेद व्यक्त करता है एवं यात्रियों से रेल प्रगति के कार्यो मे सहयोग की अपेक्षा करता है ,वही रेलवे जोन सलाहकार समिति के सदस्य राजेश शर्मा ने इस दौरान 18237 बिलासपुर अमृतसर छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस को बिलासपुर से रायपुर के बीच पैसेंजर ट्रैन के रूप में चलाने की मांग की है।

Share:

श्री मावली माता मंदिर सिंगारपुर प्रबंधन समिति द्वारा निशुल्क सिलाई एवं कंप्यूटर प्रशिक्षण , हजारो छात्राएं /महिलाएं हो चुके है लाभान्वित .....!!!

श्री मावली माता मंदिर सिंगारपुर प्रबंधन समिति द्वारा नि:शुल्क सिलाई एवं कंप्यूटर प्रशिक्षण


          प्रबंधन समिति द्वारा दो तरह का कोर्स चलाया जा रहा है पहला कंप्यूटर में डाटा एंट्री ऑपरेटर तथा दूसरा सिलाई एवं कढ़ाई का दोनों कोर्स निशुल्क है।  कौशल उन्नयन  का कुशल प्रशिक्षण लेने के बाद सभी स्वरोजगार से जुड़ते जा रहें है । 
       पिछले दो वर्षो से सफलता पूर्वक संचालित हो रहे इस संस्था के माध्यम से 3-3 माह के प्रशिक्षण उपरांत लगभग 1500 महिला अभ्यर्थी लाभान्वित हुए हैं ! यह प्रशिक्षण केवल महिला अभ्यर्थियों के लिए है!

01.सिलाई प्रशिक्षण में विभिन्न प्रकार के डिजाइन कढ़ाई एवं बुनाई तथा सिलाई सिखाया जाता है

02.कंप्यूटर प्रशिक्षण में बेसिक कंप्यूटर  के पैकेज जैसे- एमएस ऑफिस वर्ड MS office word, एमएस ऑफिस एक्सेल MS office Excel, एमएस ऑफिस पावरप्वाइंट MS office PowerPoint आदि तथा हिंदी एवं अंग्रेजी टाइपिंग Hindi and English typing, बेसिक इंटरनेट basic Internet-email web browser internet suffering ऑपरेटिंग सिस्टम operating system information, बेसिक हार्डवेयर-सॉफ्टवेयर की नॉलेज basic hardware and software ki knowledgeतथा तथा उपयोगी एप्लीकेशन window Accessories की जानकारी दी जाती है!

अधिक जानकारी के लिए श्री मावली माता सेवा प्रबंधन समिति सिंगारपुर के कार्यालय से संपर्क करें!

प्रबन्धन समिति सम्पर्क - 

  • Umesh Kumar Sahu -9575740574
  • Harnarayan Dubey  -9203005737
  • Deendyal Sahu        -9229692134
  • Chhavi Vaishnav    -9926119680

ये भी देंखे -माँ मौली देवी मंदिर सिंगारपुर-पर्यटन स्थल के कुछ अनजाने किवदंतियां

Share:

चुनावी तिहार चालू , लेकिन भावी सरपंच महोदय 'कोठार छोल' रहे हैं।

भारत में बाकी कुछ हो न हो चुनाव नियमित रूप से होते हैं। हर दो - चार महीने में कहीं न कहीं, कोई न कोई चुनाव हो ही जाता है। यहाँ चुनाव का मौसम फिर आ रहा है। शहर से लेकर गांव तक का माहौल गर्म है। हर तरफ राजनीति ही चर्चा का विषय बनी हुई है। चूँकि भारत एक नेताप्रधान देश है इसलिए यहाँ बच्चा चलना बाद में सीखता है, नेतागीरी पहले.. पीएचडी डिग्री धारकों से लेकर बीपीएल कार्ड धारकों तक हर कोई चुनाव विश्लेषक बने हुए हैं, और भारतीय राजव्यवस्था के बारे में हर किसी के पास एम. लक्ष्मीकांत के टक्कर की इल्म है। इनमें से कुछ लोग स्वयं को भैया जी का खास बताते हैं. ये भैया जी के छुटभइये होते हैं जो नेताजी के द्वार पर सुबह से हाजिरी देने पहुंच जाते हैं और उनके दर्शन का इंतजार करते हैं. जैसे ही भैया जी नित्यकर्म से निवृत्त हो चाय पीते हुए बाहर आते हैं, ये दांत निपोरते हुए उनके चरणों में साष्टांग लोट जाते हैं.. गांव में जब भी कोई बड़ा नेता आता है अथवा ये किसी नेता के रैली में शामिल होने शहर जाते हैं तो इनकी कोशिश होती है कि भीड़ में धक्के, मुक्के या रहपट - लात खाकर चाहे जैसे भी हो उनके करीब पहुंच जायें और एक जबरदस्ती का सेल्फी ले लें ताकि गांव वालों को दिखाकर कह सकें कि नेताजी ने स्वयं बुलाकर साथ में फोटो खिंचवाया है। हाथ जोड़े मुद्रा में नेता जी और मोबाइल धारी मुद्रा में स्वयं की फोटो वाली बड़ा सा फ्लेक्स छपवाकर बस स्टैंड में लगवा देंगे और रोज आत्ममुग्धता से खुद ही निहारेंगे। रात की सभा में चार निठल्लों को जुटाकर ये धीमी आवाज में गोपनीय जानकारी देंगे और कहेंगे कि सिर्फ इन्हें ही भैया जी ने अपना खास आदमी समझ कर बताया है कि मंत्री जी से इतना पैसा मिल गया है, इतने पेटी 'चेपटी' पहुंच चुकी है, पार्टी किसका काटेगी (टिकट) और कौन बगावत करेगा, किस विपक्षी नेता का चक्कर किससे चल रहा है और कब फोटो-वीडियो लीक होने वाला है आदि - इत्यादि।
इधर नेताजी की भी चिंता बढ़ी हुई है... लेकिन संपत्ति और तोंद उससे कहीं ज्यादा बढ़ गई है। अब उन्हें भी खुद से ज्यादा अपने लंपटों पर भरोसा है इसलिए ये भी उन्हें थोड़ा भाव देने लगे हैं; जैसे चाय - पानी के लिए पूछ लेना, नाम के आगे भाई लगाकर संबोधित करना, कुछ खर्चा-पानी उपलब्ध करा देना आदि। इतने से चचा जान खुद को खलीफा समझ बैठते हैं और स्वयं को आगामी पंचायत चुनाव में भैया जी समर्थित सरपंच प्रत्याशी घोषित कर देते हैं।
 मन के घोड़े हवा में दौड़ाते हुए जब ये घर पहुंचते हैं तो इनकी अम्मा झाड़ू लेकर दौड़ाती है और कहती है - "रोगहा नइ तो कांहि काम धाम करे बर नइ हे अउ नेता बने फिरत हस, कोठार ल कोन तोर ददा छोलही. जब तक कोठार नइ छोलाही खाय बर पसिया तक नइ मिलय.. " 
अब मन के घोड़े गधे का रूप धारण कर चुके हैं और भावी सरपंच महोदय 'कोठार छोल' रहे हैं।

साभार 
दीपक दुबे 
राजनीतिक व्यंग्य कार और सामाजिक विश्लेषक
Share:

जाने क्या है राज की हरसिंगार जिसे पारिजात भी कहते है??

हरसिंगार एक दिव्य वृक्ष माना जाता है। हरसिंगार जिसे पारिजात भी कहते हैं, एक सुन्दर वृक्ष होता है, जिस पर सुन्दर व सुगन्धित फूल लगते हैं। पारिजात का वृक्ष दस से पन्द्रह फीट ऊँचा होता है। हिन्दू धर्म में इस वृक्ष को बहुत ही ख़ास स्थान प्राप्त है।

पौराणिक उल्लेख

एक मान्यता के अनुसार परिजात वृक्ष की उत्पत्ति समुद्र मंथन से हुई थी, जिसे इन्द्र ने अपनी वाटिका में लगाया था। हरिवंशपुराण में एक ऐसे वृक्ष का उल्लेख मिलता है जिसको छूने से देव नर्तकी उर्वशी की थकान मिट जाती थी । एक बार नारद मुनि इस वृक्ष से कुछ फूल इन्द्र लोक से लेकर कृष्ण के पास आये । कृष्ण ने वे फूल अपनी पत्नी रुक्मणी को दे दिये थे । यह जानकर सत्यभामा को क्रोध आ गया और उन्होंने ने कृष्ण के पास वृक्ष की मांग की ।

*भगवान हरि का श्रृंगार

हरसिंगार या हरिश्रृंगार का पुष्प भगवान हरि के श्रृंगार एवं पूजन में प्रयोग किया जाता है, इसलिए इस मनमोहक व सुगंधित पुष्प को ‘हरसिंगार’ के नाम से जाना जाता है । ऐसा कहा जाता है कि श्री कृष्ण इस दिव्य वृक्ष को स्वर्ग से धरती पर लाए थे और जब कृष्ण परिजात का वृक्ष ले जा रहे थे तब देवराज इन्द्र ने वृक्ष को यह श्राप दे दिया कि इस पेड़ के फूल दिन में नहीं खिलेंगे । हरिवंश-पुराण के अनुसार, यह दिव्य वृक्ष इच्छापूरक भी है।

*’पारिजात’ नाम की एक राजकुमारी

मान्यता यह भी है कि ‘पारिजात’ नाम की एक राजकुमारी हुआ करती थी, जिसे भगवान सूर्य से प्रेम हो गया था। लेकिन भगवान सूर्य ने पारिजात के प्रेम कों स्वीकार नहीं किया, जिससे खिन्न होकर राजकुमारी पारिजात ने आत्महत्या कर ली। जिस स्थान पर पारिजात की क़ब्र बनी, वहीं से पारिजात नामक वृक्ष ने जन्म लिया। लेकिन सूर्य उदय के साथ ही पारिजात की टहनियाँ और पत्ते खिल जाते हैं

*बाराबंकी का पारिजात वृक्ष

कहा जाता है कि जब पांडव पुत्र माता कुन्ती के साथ अज्ञातवास व्यतीत कर रहे थे, तब उन्होंने ही सत्यभामा की वाटिका में से परिजात को लेकर बोरोलिया गाँव में रोपित कर दिया। पारिजात वृक्ष आज भी उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जनपद के अंतर्गत रामनगर क्षेत्र के गाँव बोरोलिया में मौजूद है।

*देवी लक्ष्मी को प्रिय*

धन की देवी लक्ष्मी को पारिजात के पुष्प प्रिय हैं। उन्हें प्रसन्न करने में भी पारिजात वृक्ष का उपयोग किया जाता है। कहा जाता है के, होली, दीवाली, ग्रहण, रवि पुष्प तथा गुरु पुष्प नक्षत्र में पारिजात की पूजा की जाए तो उत्तम फल प्राप्त होता है।

🕉🐚⚔🚩🌞🇮🇳⚔🌷🙏🏻
                        प्रस्तुति
             "पं.खेमेश्वर पुरी गोस्वामी"
            धार्मिक प्रवक्ता-ओज कवि
          प्रदेश संगठन मंत्री एवं प्रवक्ता
   अंतरराष्ट्रीय युवा हिंदू वाहिनी छत्तीसगढ़
      ८१२००३२८३४-/-७८२८६५७०५७

Share:

सिन्धु सभ्यता की लिपि को नहीं पढ़ा जाना बड़ी साजिश|| धार्मिक प्रवक्ता-ओज कवि

जेनेटिक साइंस *गुणसूत्र विज्ञान* के विविध अनुसंधानों से अब जब यह सिद्ध हो चुका है कि सिन्धु घाटी सभ्यता वास्तव में वैदिक आर्यों की ही एक पुरानी सभ्यता थी और *भारत भूमि ही आर्यों की उद्गम भूमि रही है* तब उसके अवशेषों में उपलब्ध लिखित सामग्रियों की लिपि को अब तक नहीं पढ़ा जाना एक गहरे साजिश का परिणाम प्रतीत हो रहा है। 

इजिप्ट, चीनी, फोनेशियाई, आर्मेनिक तथा सुमेरियाई और मेसोपोटामियाई सभ्यताओं की लिपियां जब पढ़ ली गई हैं, तब सिन्धु सभ्यता के अवशेषों को आखिर अब तक क्यों नहीं पढ़ा जा सका है? जबकि, *जेनेटिक साइंस एवं कम्प्यूटर टेक्नोलॉजी से प्राचीन लिपियों का पढ़ा जाना पहले की तुलना में अब ज्यादा आसान हो गया है।

भारत के इतिहास को सही दिशा में सुव्यवस्थित करने के निमित्त इसका पढ़ा जाना आवश्यक है; पहले इस सभ्यता का विस्तार पंजाब, सिंध, गुजरात एवं राजस्थान तक बताया जाता था, किन्तु *नवीन वैज्ञानिक विश्लेषणों के आधार पर अब इसका विस्तार तमिलनाडु से वैशाली (बिहार) तक समूचा भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान तथा ईरान तक बताया जा रहा है।

कालक्रम भी अब 7000 वर्ष ईसापूर्व तक आंका जाने लगा है, इतनी महत्वपूर्ण सभ्यता के लिखित अवशेषों को अब तक नहीं पढ़ा जाना और बिना पढ़े ही उसके बारे में भ्रम पैदा करने वाली अटकलें लगाते रहना, स्वयं की जड़ों पर स्वयं ही कुल्हाड़ी मारने के समान है।

पश्चिम के एक प्रसिद्ध इतिहासकार *अर्नाल्ड जे टायनबी ने ठीक ही कहा है कि विश्व में अगर किसी देश के इतिहास के साथ सर्वाधिक छेड़छाड़ किया गया है, तो वह भारत का इतिहास है;* दरअसल, हुआ यह कि ऐतिहासिक विरासतों-अवशेषों का संरक्षण-विश्लेषण करने वाली हमारी संस्था *भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद* आरम्भ से ही उस अंग्रेजी शासन के कब्जे में रही है, जो ईसाइयत को श्रेष्ठत्तम व प्राचीनत्तम सिद्ध करने की दृष्टि के तहत काम करता रहा। 

अपनी इसी नीति के तहत अंग्रेजी औपनिवेशिक इतिहासकारों ने यह कहानी गढ़ रखी है कि आर्य लोग भारत के मूल निवासी नहीं, बल्कि बाहर के आक्रमणकारी थे, उनके आक्रमण से ही सिन्धु घाटी सभ्यता नष्ट हो गई; अंग्रेजी शासन की समाप्ति के बाद से लेकर आज तक *भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद* पर उन्हीं के झण्डाबरदार वामपंथियों का कब्जा रहा है, जो उनकी छद्म योजनाओं को आकार देते रहे। 

इसी कारण इस प्राचीन सभ्यता के अवशेषों में उपलब्ध बर्तनों, पत्थरों, पट्टियों आदि पर विद्यमान लिखावटों को आज तक नहीं पढ़ा गया, बहाना यह बनाया जाता रहा कि उन लिखावटों की लिपि को पढ़ना सम्भव नहीं है; जबकि, सच यह है कि किसी भी प्राचीन लिपि के अक्षरों की आवृति का विश्लेषण करने की *‘मार्कोव विधि’* से उसका पढ़ना अब सरल हो गया है।

दरअसल, भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद पर कब्जा जमाये वामपंथी इतिहासकार दूसरे कारणों से इस लिपि की पठनीयता को अपठनीय बताते रहे हैं, सबसे बड़ा कारण यह है कि *इसे पढ़ लिये जाने से उनकी झूठी ऐतिहासिक स्थापनाएं ध्वस्त हो जाएंगी;* मसलन यह कि तब सिन्धु सभ्यता की प्राचीनता मिस्र (इजिप्ट), चीन, रोम, ग्रीस, मेसोपोटामिया व सुमेर की सभ्यता से भी अधिक पुरानी सिद्ध हो जाएगी; उन्हें यह *भय है कि सिन्धु सभ्यता की लिपि को पढ़ लिए जाने से वह वैदिक सभ्यता साबित हो जाएगी;* इससे आर्य-द्रविड़ संघर्ष की उनकी गढ़ी हुई कहानी तात-तार हो जाएगी। 

ईसाई विस्तारवादी औपनिवेशिक अंग्रेजों की यह जो आधारहीन स्थापना है कि आर्य लोग अभारतीय बाहरी आक्रमणकारी हैं, उन्होंने भारत के मूल निवासियों अर्थात सिन्धु घाटी के लोगों को दक्षिण में खदेड़ दिया, जहाँ वे आदिवासी के तौर पर जंगलों में छिपकर रहने लगे और वे लोग द्रविड़ हैं, यह गलत साबित हो जाएगा। 

यही कारण है कि औपनिवेशिक वामपंथी इतिहासकारों में से कुछ लोग सिन्धु घाटी सभ्यता की लिपि को सुमेरियन भाषा से जोड़कर पढ़ने का प्रयास करते रहे तो कुछ लोग इसे चीनी भाषा के नजदीक ले जाते हैं; उन्हीं इतिहासकारों में से कुछ इसे मुंडा आदिवासियों की भाषा बताते हैं तो कुछ इसे ईस्टर द्वीप के आदिवासियों की भाषा से जोड़कर पढ़ने की वकालत करते हैं। 

जबकि सच यह है कि सिन्धु घाटी सभ्यता की लिपि *‘ब्राम्ही’* लिपि से मिलती-जुलती हुई है, जिसे पूर्व ब्राम्ही लिपि कहा जा सकता है; उसमें लगभग 400 प्रकार के अक्षर चिह्न और 39 अक्षर हैं, ठीक वैसे ही जैसे रोमन में 26 और देवनागरी में 52 प्रकार के अक्षर हैं; *ब्राम्ही लिपि भारत की प्राचीनतम लिपियों में से एक है ..*..

जो वैदिक काल से लेकर गुप्त काल तक प्रचलन में रही, इसी लिपि से पाली, प्राकृत व संस्कृत की कई लिपियों का निर्माण हुआ है। 

सम्राट अशोक ने गौतम बुद्ध के *‘धम्म’* का प्रचार-प्रसार इसी लिपि में कराया था, उसके सारे शिलालेख इसी लिपि में हैं; सिन्धु घाटी सभ्यता के लेखों की लिपि और ब्राम्ही लिपि में अनेक समानताएं पाई गई हैं ब्राम्ही की तरह वह लिपि भी बाएं से दाएं लिखी पायी गई है; जिसमें स्वर, व्यंजन एवं उनके मात्रा चिह्नों सहित लगभग 400 अक्षर चिह्न हैं।

पुरातात्विक सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार सिन्धु घाटी सभ्यता के अवशेषों में से लगभग 3000 लेख प्राप्त हुए हैं;* जिन्हें पढ़ने की आधी-अधूरी कोशिश हुई भी है तो अभारतीय लिपियों के आधार पर हुई है, ब्राम्ही लिपि के आधार पर इसे पढ़ने की कोशिश करने वाले इतिहासकारों के अनुसार इसके 400 अक्षर चिह्नों में 39 अक्षरों का व्यवहार सर्वाधिक 80 प्रतिशत बार हुआ है; *ब्राम्ही लिपि के आधार पर इसे पढ़ने से संस्कृत के ऐसे कई शब्द बनते हैं, जो उन अवशेषों के संदर्भों से मेल खाते हैं ..

जैसे- श्री, अगस्त्य, मृग, हस्त, वरुण, क्षमा, कामदेव, महादेव, मूषक, अग्नि, गृह, यज्ञ, इंद्र, मित्र, कामधेनु आदि; बावजूद इसके उसे पढ़ने की दिशा को भारत से सुदूर देशों की लिपि अथवा असंस्कृत भाषाओं की लिपि की तरफ मोड़ने की चेष्टा होती रही है। 

सिन्धु सभ्यता की लिपि को पढ़ने में एकमात्र कठिनाई यह है कि उसकी लिखावट की शैली में अनेक भिन्नताएं हैं, जिसे सम्यक दृष्टि से सुलझाया जा सकता है; ब्राम्ही लिपि के आधार पर उस प्राचीन भारतीय सभ्यता के लेखों को पढ़ने से यह स्पष्ट हो जाएगा कि उस काल की भाषा वही थी जो वेदों की भाषा है, अर्थात *सिन्धु घाटी सभ्यता के लोग उस वैदिक धर्म व वैदिक संस्कृति से ही सम्बद्ध थे, जिससे आज का सनातन हिन्दू समाज सम्बद्ध है;* साथ ही, यह भी कि आर्य और द्रविड़ कोई अलग-अलग जातियां नहीं थीं, यह सत्य स्थापित हो जाने से आर्य-द्रविड़ विभेद का दरार स्वतः समाप्त हो जाएगा; जिसे ईसाई विस्तारवादी इतिहासकारों ने ईसाइयत के विस्तार और भारत राष्ट्र व हिन्दू समाज में विखण्डन की अपनी कुटिल कूटनीति के तहत कायम किया हुआ है, *जिसकी वजह से दक्षिण भारत में भाषिक-सांस्कृति अलगाव पनप रहा है।

ऐसे में एक साजिश के तहत *सिन्धु घाटी सभ्यता के लेखों को भारतीय दृष्टि से भारतीय लिपि के आधार पर नहीं पढ़ा जाना एक राष्ट्रीय त्रासदी से कम नहीं है;* इसी कारण भारत के इतिहास को वास्तविक स्वरुप नहीं मिल पा रहा है और इसके प्रति तरह-तरह के भ्रम कायम हैं।
🕉🐚⚔🚩🌞🇮🇳⚔🌷🙏🏻

                        प्रस्तुति
             "पं.खेमेश्वर पुरी गोस्वामी"
            धार्मिक प्रवक्ता-ओज कवि
          प्रदेश संगठन मंत्री एवं प्रवक्ता
   अंतरराष्ट्रीय युवा हिंदू वाहिनी छत्तीसगढ़
      ८१२००३२८३४-/-७८२८६५७०५७
Share:

Followers

Search This Blog

Popular Posts

Blog Archive

Popular Posts