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Thursday, June 20, 2019

समुद्र जैसा तालाब : बालसमुंद पलारी

तालाबों की कथा किसी तिलस्म से कम नहीं है, इनकी प्राचीनता के साथ कथा कहानियाँ भी जुड़ जाती हैं और पीढी दर पीढी अग्रेषित होती रहती हैं। ऐसा ही एक तालाब है जिसे बालसमुंद कहते हैं। यह रायपुर से बलौदाबाजार रोड़ पर 70 किमी की दूरी पर पलारी ग्राम की पहचान बना हुआ है। इस तालाब का विस्तार लगभग 120 एकड़ में बताया जाता है। 
बालसमुंद पलारी 

मानव निर्मित यह तालाब अपनी विशालता के कारण जलाशय कहलाता है। इसके बीच में एक टापू बना हुआ है, कहते हैं कि तालाब खोदने वाले संझाकाल में घर जाने वक्त अपनी मिट्टी फ़ेंकने की टोकरियाँ (बांस का झौंआ) झाड़ते थे। जिसके कारण इस टापू का निर्माण हो गया। इससे तालाब निर्माण के दौरान नियोजित श्रमिकों की संख्या का अंदाजा लगाया जा सकता है। 


दक्षिण कोसल में ईंटों से मंदिर निर्माण की परम्परा रही है। इस तालाब के किनारे भी ईंटो बना हुआ सिद्धेश्वर नामक शिवालय है। पुराविद इसका निर्माण काल 7 वीं 8 शताब्दी निर्धारित करते हैं, इस पश्चिमाभिमुख मंदिर में द्वार शाखा पर नदी देवी गंगा एवं यमुना अपने परिचारको के साथ त्रिभंग मुद्रा में प्रदर्शित की गई है।
शिवालय बालसमुंद पलारी 

सिरदल पर त्रिदेवों का अंकन है। द्वारशाखाओं पर अष्ट दिक्पालों के अंकन के साथ प्रवेश द्वार के सिरदल पर शिव विवाह का सुंदर अंकन किया गया है। इस मंदिर का शिखर भाग कीर्तिमुख, गजमुख एवं व्याल की आकृतियों से अलंकृत है जो चैत्य गवाक्ष के भीतर निर्मित हैं। विद्यमान छत्तीसगढ़ के ईंट निर्मित मंदिरों का यह उत्तम नमूना है। 


कहते हैं कि इस तालाब का निर्माण घुमंतू नायक जाति के राजा ने छैमासी रात में करवाया था। घुमंतू नायक एक बार अपने लाव लश्कर के साथ इस स्थान पर डेरा लगाए। उस समय यह जंगल था और निस्तारी के लिए पानी उपलब्ध नहीं था। तब नायक राजा ने यहाँ तालाब बनवाने का निर्णय लिया। उसने 120 एकड़ में इस तालाब का निर्माण कराया, परन्तु तालाब में पानी नहीं भरा, वह सूखा का सूखा रहा। 
नदी देवी शिवालय बालसमुंद पलारी 

तब सयानों के कहने पर नायक राजा ने अपने नवजात शिशु को परात में रख कर तालाब में छोड़ दिया। इस टोटके के बाद रात में तालाब भर गया और बालक भी परात सहित ऊपर आ गया। तब से इस तालाब का नाम बालसमुंद हो गया। इस तालाब में बारहों महीना पानी रहता है तथा यहाँ का जल नीला एवं निर्मल है। तालाब के किनारे खड़े होने पर जल का विस्तार देखकर समुद्र के किनारे खड़े होने का भान होता है। इसकी विशालता अपना नाम सार्थक करती है।

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